Sunday, May 24, 2015

महर्षि अगस्त्य

निश्चित ही बिजली का आविष्कार बेंजामिन फ्रेंक्लिन ने किया लेकिन बेंजामिन फ्रेंक्लिन अपनी एक किताब में लिखते हैं कि एक रात मैं संस्कृत का एक वाक्य पढ़ते-पढ़ते सो गया। उस रात मुझे स्वप्न में संस्कृत के उस वचन का अर्थ और रहस्य समझ में आया जिससे मुझे मदद मिली।
महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ऋषि थे। महर्षि अगस्त्य राजा दशरथ के राजगुरु थे। इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती है। ऋषि अगस्त्य ने 'अगस्त्य संहिता' नामक ग्रंथ की रचना की। आश्चर्यजनक रूप से इस ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्र मिलते हैं-
संस्थाप्य मृण्मये पात्रे
ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन
चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
-अगस्त्य संहिता
अर्थात : एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएं, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Electricity) का उदय होगा।
अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबे या सोने या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं।

Friday, May 22, 2015

एक बार इस कविता को दिल से पढ़िये शब्द शब्द में गहराई है..

जब आंख खुली तो अम्मा की
गोदी का एक सहारा था
उसका नन्हा सा आंचल मुझको
भूमण्डल से प्यारा था
उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था
उसके स्तन की एक बूंद से
मुझको जीवन मिलता था
हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस मां ने पुचकारा
हमको जी भर के प्यार किया
मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी
मैं बनूं बुढापे में उसका
बस एक सहारा कहती थी
उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज
अन्तर में सदा सहेजा था
मेरे सारे प्रश्नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी
मैं बडा हुआ तो कॉलेज से
इक रोग प्यार का ले आया
जिस दिल में मां की मूरत थी
वो रामकली को दे आया
शादी की पति से बाप बना
अपने रिश्तों में झूल गया
अब करवाचौथ मनाता हूं
मां की ममता को भूल गया
हम भूल गये उसकी ममता
मेरे जीवन की थाती थी
हम भूल गये अपना जीवन
वो अमृत वाली छाती थी
हम भूल गये वो खुद भूखी
रह करके हमें खिलाती थी
हमको सूखा बिस्तर देकर
खुद गीले में सो जाती थी
हम भूल गये उसने ही
होठों को भाषा सिखलायी थी
मेरी नीदों के लिए रात भर
उसने लोरी गायी थी
हम भूल गये हर गलती पर
उसने डांटा समझाया था
बच जाउं बुरी नजर से
काला टीका सदा लगाया था
हम बडे हुए तो ममता वाले
सारे बन्धन तोड. आए
बंगले में कुत्ते पाल लिए
मां को वृद्धाश्रम छोड आए
उसके सपनों का महल गिरा कर
कंकर-कंकर बीन लिए
खुदग़र्जी में उसके सुहाग के
आभूषण तक छीन लिए
हम मां को घर के बंटवारे की
अभिलाषा तक ले आए
उसको पावन मंदिर से
गाली की भाषा तक ले आए
मां की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है
गर मां अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है
घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी मां क्या पाती है
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है
जो मां जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं
मां जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है
मां के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है
मां के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है
मां के चरणों में जन्नत है
गिरिजाघर और शिवाला है
हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है
दुनियां में जितनी खुशबू है
मां के आंचल से आई है
मां कबिरा की साखी जैसी
मां तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है
मां आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है
मां वेद ऋचाओं की गरिमा
मां महाकाव्य की काया है
मां मानसरोवर ममता का
मां गोमुख की उंचाई है
मां परिवारों का संगम है
मां रिश्तों की गहराई है
मां हरी दूब है धरती की
मां केसर वाली क्यारी है
मां की उपमा केवल मां है
मां हर घर की फुलवारी है
सातों सुर नर्तन करते जब
कोई मां लोरी गाती है
मां जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है
मां हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है
माना मेरे घर की दीवारों में
चन्दा सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल मां की मूरत है
मां सरस्वती लक्ष्मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है
मां पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है
अम्मा तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है
हे मां तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है
सारे तीरथ के पुण्य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं
जिनके कोई सन्तान नहीं
मैं उन मांओं का बेटा हूं
हर घर में मां की पूजा हो
ऐसा संकल्प उठाता हूं
मैं दुनियां की हर मां के
चरणों में ये शीश झुकाता हूं...

Thursday, May 21, 2015

जनेऊ पहनने के लाभ

जनेऊ पहनने के लाभ
पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी हो गई है। जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढऩे का अधिकार मिलता था। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा मल-मूत्र विसर्जन के समय कान के पास ही एक नस से कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देता है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपना जनेऊ कान पर से तब तक नहीं उतार सकता जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

Thursday, May 14, 2015

बोधिधर्मन

बोधिधर्मन
कई बार हमें शाओलिन मॉन्क से जुड़ी ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं जिनके बारे में जानकर हैरत होती है। कोई शाओलिन मॉन्क पानी पर दौड़ लगाता है तो कोई कड़ाही में खौलते पानी में बैठ जाता है, इसके बावजूद उसे कुछ नहीं होता है। दरअसल, ये एक आर्ट है जिस वजह से शाओलिन भिक्षु ऐसा कर गुजरते हैं।
क्या आप जानते हैं कि ये कला चीन और जापान जैसे देशों में कहां से आई? बता दें कि एक भारतीय शख्स ने इस कला को दुनिया के कई देशों में फैलाया था। इस शख्स का नाम बोधिधर्मन था। ऐतिहासिक तथ्यों की मानें तो इन्होंने ही चीन-जापान के लोगों को मार्शल आर्ट सिखाई थी, जिस पर आज वे पूरी दुनिया में इतराते हैं।
कौन थे बोधिधर्मन
आखिर ये बोधिधर्मन कौन थे? बता दें कि बोधिधर्मन मार्शल आर्ट और आयुर्वेद चिकित्सा के जानकार थे। इनका जन्म दक्षिण भारत में पल्लव राज परिवार में हुआ था। वह कांचीपुरम के राजा के पुत्र थे, लेकिन छोटी आयु में ही उन्होंने राज्य छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए। इसी क्रम में वे चीन पहुंचे, जहां उन्होंने लोगों की रक्षा की और उन्हें महामारी से भी बचाया। चीन के लोगों ने मार्शल आर्ट और आयुर्वेद चिकित्सा सीखने की इच्छा जाहिर की, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
भारत में अमूमन ज्यादातर लोगों को बोधिधर्मन के बारे में कोई भी जानकारी नहीं है। लेकिन चीन में अधिकतर लोगों को बोधिधर्मन के बारे में पता है। वहां पर इन्हें धामू के नाम से भी जाना जाता है। इतना ही नहीं, शाओलिन टेंपल में इनकी मूर्तियां स्थापित हैं और लोग इन्हें पूजते हैं।
बन चुकी है फिल्म
दक्षिण भारतीय भाषा में बोधिधर्मन के पर फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि अपनी मां की इच्छा के अनुसार बोधिधर्मन चीन पहुंचते हैं। वहां पर लोगों को आत्मरक्षा और चिकित्सा की जानकारी देते हैं। हालांकि, अंत में जब वे अपने देश लौटने की इच्छा जाहिर करते हैं, तो वहां के विद्वान यह आशंका व्यक्त करते हैं कि उनके जाने से महामारी फिर से आ सकती है। इसके बाद वहां के लोगों ने उन्हें खाने में जहर दे दिया। हालांकि, बोधिधर्मन को इसका पता चल गया था, इसके बावजूद उन्होंने जहरीला भोजन ग्रहण कर लिया। इस फिल्म में सुपरस्टार सूर्या ने बोधिधर्मन की भूमिका निभाई थी।
चाय के अन्वेषक हैं बोधिधर्मन
ऐसा कहा जाता है कि बोधिधर्मन चाय के अन्वेषक हैं। इसको लेकर दंत कथाएं भी प्रचलित हैं। एक दंत कथा के मुताबिक, एक बार बोधिधर्मन ध्यान करते-करते सो गए। इस बात से उन्हें अपने ऊपर इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी पलकों को ही काट डाला। जब उनकी कटी पलकें जमीन पर गिरी, तो वे चाय का पौधा बन गईं। तब से नींद से बचने के लिए भिक्षुओं को चाय पहुंचाई जाने लगी।
कलारिपयात्तु की देन है मार्शल आर्ट
वर्तमान के मार्शल आर्ट चाहे वो कुंग फू हो या वुशु या फिर ताइक्वांडो और कराटे, ये सब प्राचीन भारतीय आत्मरक्षा शैली कलारिपयात्तु की देन हैं। आज भी दक्षिण भारत में लोग इस कला को सीखते हैं। बॉलीवुड एक्टर विद्युत जामवाल भी इस कला में एक्सपर्ट हैं।

Saturday, May 9, 2015

एक हरियाणवी कविता होली सुसराड़ की

एक हरियाणवी कविता होली सुसराड़ की

मैं गया सुसराड़
नया कुर्ता गाड़

दाढ़ी बनवाई बाल रंग्वाए
रेहड़ी पर ते संतरे तुलवाए

हाथ मैं दो किलो फ्रूट
मैं हो रया सुटम सूट

फागन का महिना था
आ रया पसीना था

पोहंच गया गाम मैं
मीठे मीठे घाम मैं

सुसराड़ का टोरा था
मैं अकड में होरा था

साले मिलगे घर के बाहर
बोले आ रिश्तेदार आ रिश्तेदार

बस मेरी खातिरदारी शुरू होगी
रात ने खा पीके सोगया तडके मेरी बारी शुरू होगी

सोटे ले ले शाहले आगी
मेरे ते मिठाईया के पैसे मांगन लागी

दो दो चार चार सबने लगाये
पैसे भी दिए और सोटे भी खाए

साली भी मेरी मुह ने फेर गी
गाढ़ा रंग घोल के सर पे गेर गी

सारा टोरा होगया था ढिल्ला ढिल्ला
गात होगया लिल्ला लिल्ला गिल्ला गिल्ला

रहा सहा टोरा साला ने मिटा दिया
भर के कोली नाली में लिटा दिया

साँझ ताहि देहि काली आँख लाल होगी
बन्दर बरगी मेरी चाल होगी

बटेऊ हाडे तो नु हे सोटे खावेगा
बता फेर होली पे हाडे आवेगा

मैं हाथ जोड़ बोल्या या गलती फेर
नहीं दोहराऊंगा

होली तो के मैं थारे दिवाली ने
भी नहीं आउंगा.............

Friday, May 8, 2015

आहिस्ता चल जिंदगी

आहिस्ता  चल  जिंदगी,अभी
कई  कर्ज  चुकाना  बाकी  है
कुछ  दर्द  मिटाना   बाकी  है
कुछ   फर्ज निभाना  बाकी है
                   रफ़्तार  में तेरे  चलने से
                   कुछ रूठ गए कुछ छूट गए
                   रूठों को मनाना बाकी है
                   रोतों को हँसाना बाकी है
कुछ रिश्ते बनकर ,टूट गए
कुछ जुड़ते -जुड़ते छूट गए
उन टूटे -छूटे रिश्तों के
जख्मों को मिटाना बाकी है
                    कुछ हसरतें अभी  अधूरी हैं
                    कुछ काम भी और जरूरी हैं
                    जीवन की उलझ  पहेली को
                    पूरा  सुलझाना  बाकी     है
जब साँसों को थम जाना है
फिर क्या खोना ,क्या पाना है
पर मन के जिद्दी बच्चे को
यह   बात   बताना  बाकी  है
                     आहिस्ता चल जिंदगी ,अभी
                     कई कर्ज चुकाना बाकी    है
                     कुछ दर्द मिटाना   बाकी   है  
                     कुछ  फर्ज निभाना बाकी है !

Sunday, April 19, 2015

खजुराहो की मूर्ति कनाडा से वापस लाए मोदी छतरपुर फिर उभरा विश्व मानचित्र पर....


विश्व पर्यटन स्थल खजुराहो से चार साल पहले चोरी हुई एक मूर्ति को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कनाड़ा से वापस लाए हैं। यह मूर्ति उन्हें वहां के चांसलर स्टीफन हारफर ने भेंट की है। इसके अलावा मोदी ने देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कनाड़ा और जर्मनी के दौरे पर अपने प्लेन में खजुराहो का आइकॉन लगाकर पर्यटकों को खजुराहो आने का न्योता भी दिया है।
चार साल से कनाड़ा में थी पैरेट लेडी ...
वर्ष 2011 में खजुराहो के संग्रहालय से पैरेंट लेडी की तीन फीट ऊंची पुरातत्व महत्व की मूर्ति चोरी हो गई थी। करीब 900 साल पुरानी इस मूर्ति को एक कनाडाई मूल के नागरिक से कनाड़ा में बरामद किया गया था। इस मूर्ति को पाने के लिए चार साल से ऑर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और भारतीय विदेश विभाग अपने दूतावास के जरिए प्रयास कर रहा था। बुधवार को कनाड़ा पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह मूर्ति कनाडा के चांसलर स्टीफन हरफर ने भेंट की। मूर्ति की खास विशेषता है कि इसके कंधे पर तोता बना है। चंदेल कालीन इस मूर्ति को संग्रहालय में पैरेंट लेडी का नाम दिया गया था। आदिवर्त संग्रहालय खजुराहो के क्यूरेटर राजेंद्र देहरी ने बताया कि यह खजुराहो शैली की है और वहीं से चोरी हुई थी।
विश्व पर्यटन स्थल खजुराहो से चार साल पहले चोरी हुई एक मूर्ति को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कनाड़ा से वापस लाए हैं। यह मूर्ति उन्हें वहां के चांसलर स्टीफन हारफर ने भेंट की है। इसके अलावा मोदी ने देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कनाड़ा और जर्मनी के दौरे पर अपने प्लेन में खजुराहो का आइकॉन लगाकर पर्यटकों को खजुराहो आने का न्योता भी दिया है।
चार साल से कनाड़ा में थी पैरेट लेडी
वर्ष 2011 में खजुराहो के संग्रहालय से पैरेंट लेडी की तीन फीट ऊंची पुरातत्व महत्व की मूर्ति चोरी हो गई थी। करीब 900 साल पुरानी इस मूर्ति को एक कनाडाई मूल के नागरिक से कनाड़ा में बरामद किया गया था। इस मूर्ति को पाने के लिए चार साल से ऑर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और भारतीय विदेश विभाग अपने दूतावास के जरिए प्रयास कर रहा था। बुधवार को कनाड़ा पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह मूर्ति कनाडा के चांसलर स्टीफन हरफर ने भेंट की। मूर्ति की खास विशेषता है कि इसके कंधे पर तोता बना है। चंदेल कालीन इस मूर्ति को संग्रहालय में पैरेंट लेडी का नाम दिया गया था। आदिवर्त संग्रहालय खजुराहो के क्यूरेटर राजेंद्र देहरी ने बताया कि यह खजुराहो शैली की है और वहीं से चोरी हुई थी। मूर्ति प्राचीन पुरातात्विक धरोहर होने के कारण बेशकीमती है।
कनाड़ा के चांसलर से मूर्ति लेते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
विदेशी पर्यटकों को भारत भ्रमण पर आमंत्रित करने के लिए नरेंद्र मोदी ने खजुराहो को भी प्रचार अभियान में शामिल किया है। फ्रांस, जर्मनी और कनाडा की यात्रा के दौरान उनके प्लेन में राष्ट्रीय ध्वज के नीचे खजुराहो लिखा गया है।

सौंफ खाने के इन खास तरीकों से दूर हो जाती हैं ये हेल्थ प्रॉब्लम्स

भारतीय रसोई घर में सौंफ का महत्वपूर्ण स्थान है। सौंफ का उपयोग न सिर्फ कुछ खास व्यंजनों में किया जाता है, बल्कि भोजन के बाद भी सौंफ बहुत शौक से खाई जाती है। खाने के बाद थोड़ी सी सौंफ खाने से कैल्शियम, सोडियम, फास्फोरस, आयरन और पोटेशियम जैसे तत्व हमारे शरीर को प्राप्त होते हैं। पेट से संबंधित कुछ बीमारियों में भी सौंफ के कुछ घरेलू नुस्खे बहुत कारगर साबित होते हैं। आज हम आपको सौंफ के कुछ खास टिप्स बता रहे हैं-

1. प्रतिदिन 5-6 ग्राम सौंफ खाना लिवर और आंखों के लिए फायदेमंद होता है। अपच संबंधी विकारों में भी सौंफ का सेवन बेहद उपयोगी है। सौंफ को तवे पर थोड़ा-सा सेंक कर खाने से पेट के रोगों में आराम मिलता है।
2. गुड़ के साथ सौंफ खाने से महिलाओं का मासिक धर्म नियमित होता है। यदि गले में खराश हो जाए तो सौंफ चबाना चाहिए। सौंफ चबाने से बैठा हुआ गला साफ हो जाता है। 
3. रोजाना सौंफ खाने से खून साफ होता है व रक्त से संबंधित बीमारियों में लाभ होता है। खून साफ होने से त्वचा में भी चमक आ जाती है।

4. सौंफ के अर्क में 10 ग्राम शहद मिला कर इसका सेवन करें। खांसी में तत्काल आराम मिलेगा।

5. बेल का गूदा 10 ग्राम और 5 ग्राम सौंफ सुबह-शाम चबाकर खाने से अजीर्ण मिटता है और अतिसार में लाभ होता है।

6. सौंफ और मिश्री समान भाग में लेकर पीस लें। इसकी एक चम्मच मात्रा सुबह-शाम पानी के साथ दो माह तक लें। इससे आंखों की कमजोरी दूर होती है तथा नेत्र ज्योति में वृद्धि होती है।

Wednesday, April 15, 2015

नार्दर्न व्हाइट प्रजाति का आखिरी नर गैंडा

ये है धरती पर मौजूद नार्दर्न व्हाइट प्रजाति का आखिरी नर गैंडा। शिकारियों से बचाने के लिए 24 घंटे होती है सुरक्षा।

मोदी सरकार नें इंगलैंड की रानी का logo हटाया

मोदी सरकार नें इंगलैंड की रानी का logo हटाया,
आजादी के बाद की सरकारों में किसी में दम नहीं जों ये काम आज तक कर सकें,
शायद ये भी भांड मिडीया को दिखेगा नहीं!

Monday, March 30, 2015

आइये आज धरती पर भगवान है..सिद्ध करके दिखाता हूँ!

आइये आज धरती पर भगवान है..सिद्ध करके दिखाता हूँ!
1:-. "अमरनाथजी " में शिवलिंग अपने आप बनता है|
2:-. "माँ ज्वालामुखी" में हमेशा ज्वाला निकलती है|
3:-. "मैहर माता मंदिर" में रात को आल्हा अब भी आते हैं|
4:-. सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर में 3000 बम में से एक
का ना फूटना|
5:-. इतने बड़े हादसे के बाद भी "केदारनाथ मंदिर" का बाल
ना बांका होना|
6:-. पूरी दुनियां मैं आज भी सिर्फ "रामसेतु के पत्थर" पानी में तैरते
हैं|
7:-. "रामेश्वरम धाम" में सागर का कभी उफान न मारना|
8:-. "पुरी के मंदिर" के ऊपर से किसी पक्षी या विमान का न
निकलना|
9:-. "पुरी मंदिर" की पताका हमेशा हवा के विपरीत दिशा में
उड़ना|
10:-. उज्जैन में "भैरोंनाथ" का मदिरा पीना|
11:-. गंगा और नर्मदा माँ (नदी) के पानी का कभी खराब न होना|
12:-. उनाई (तापी) में 40° गर्म पानी 365 दिन जमींन से
निकलना जहा भगवान राम ने योगी के कुष्ठ रोग ठीक करने के लिए गर्म पानी बाण मार कर जमींन से निकाला था |

13.. भीमगोडा (सिवाना, बाङमेर ) जहा पांडव श्री भीम ने वनवास के समय माता कुंती को प्यास लगी तब पहाड़ को गोडा (घुटना) मारकर
पानी निकाला था जहाँ आज भी 365 दिन अमृत समान पानी निकलता हैं । भले ही कितना भी अकाल हो, और भयंकर अकाल के दिनों में भी यह पानी बंद नही होता है।
14 चित्तोडगढ बाण माताजी मन्दिर मे आरती के वक्त त्रिशूल का अपने आप हिलना (कम्पन) करना भी एक जीता जागता चमत्कार है।

भारत सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा अकेला मालिक है “चर्च”।

भारत सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा
अकेला मालिक है “चर्च”।
भारत सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा
अकेला मालिक है “चर्च”।
जी न्यूज़ पर चर्च के बारे में एक सर्वेक्षण हुआ है,जिसमें
बताया गया है कि भारत
सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा अकेला
मालिक है “चर्च,जी हाँ।
“चर्च” के पास इस समय समूचे भारत में 52 लाख करोड़
की भू-सम्पत्ति है।
इसमें से लगभग 50 प्रतिशत ज़मीन उसके पास अंग्रेजों के
समय से है,लेकिन बाकी
की ज़मीन तमाम केन्द्र और राज्य सरकारों ने उसे
धर्मस्व कार्य हेतु “दान” में दी है।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि धर्म के नाम पर सबसे
अधिक रक्तपात इस्लाम
और ईसाई धर्मावलम्बियों द्वारा किया गया है।
ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना,सेवा करने के लिये
स्कूल और अस्पताल खोलना
आदि चर्च के मुख्य काम हैं,लेकिन असल में इसका मकसद
ईसाईयों की संख्या में
वृद्धि करना होता है।
गरीब,ज़रूरतमंद,अशिक्षित लोग इनके फ़ेंके हुए झाँसे में
आ जाते हैं, रही-सही कसर
भारी-भरकम पैसे और नौकरी का लालच पूरी कर देता
है।
“चर्च” की सत्ता और धन-सम्पत्ति के अकूत भण्डार के
बारे में जब-तब कई पुस्तकों
और जर्नलों में प्रकाशित होता रहता है।
भारत में चर्च फ़िलहाल “गलत” कारणों से चर्चा में
है,ज़ाहिर है कि “धर्मान्तरण” के
मामले को लेकर।
इन घटनाओं पर “पोप” भी बहुत दुखी हैं और उन्होंने
भारत में अपने प्रतिनिधियों
और भारत सरकार (इसे सोनिया गाँधी पढ़े) के समक्ष
चिन्ता जताई है।
पोप का दुखी होना स्वाभाविक भी है,जिस
“एकमात्र सच्चे धर्म” का जन्म 2014
वर्ष पहले समूची धरती से “विभिन्न गलत अवधारणाओं
को मिटाने के लिये”
हुआ था,उसकी सर्वत्र थू थू हो रही है।
चर्च और पोप की सत्ता जिस “प्रोफ़ेशनल” तरीके से
काम करती है, उसे देखकर
बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ भी शर्मा जायें।
जिस तरह विशाल कम्पनियों में “बिजनेस प्लान”
बनाया जाता है,ठीक उसी तरह
रोम में ईसाई धर्म के प्रचार के लिये “वार-प्लान”
बनाया जाता है।
यह “योजनायें” विभिन्न देशों,विभिन्न
क्षेत्रों,विभिन्न धर्मों के लिये अलग-अलग
होती हैं।
इन सभी योजनाओं को “गहन मार्केटिंग रिसर्च” और
विश्लेषण के बाद तैयार किया
जाता है।
जिस प्रकार एक कम्पनी अपने अगले आने वाले 25
वर्षों का एक “प्रोजेक्शन” तैयार
करती है, उसी प्रकार इसे भी तैयार किया जाता है।
ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान में ऐसी 1590
योजनायें चल रही हैं जो कि सन्
2025 तक बढ़कर 3000 हो जायेंगी।
सन् 2025 के “प्रोजेक्शन” के अनुसार बढ़ोतरी इस
प्रकार की जाना है (यानी कि
टारगेट यह दिया गया है) वर्तमान 35500 ईसाई
संस्थायें बढ़कर 63000,धर्म
परिवर्तन के मामले 35 लाख से बढ़कर 53 लाख,4100
विभिन्न मिशनरी
संस्थायें बढ़कर 6000,,,,
56 लाख धर्म सेवकों की संख्या बढ़ाकर 65 लाख (पूरे
यूरोप की समूची सेना से भी
ज्यादा संख्या) किया जाना है।
वर्तमान में चर्च की कुल सम्पत्ति (भारत में) 13,71,000
करोड़ है (जिसमें खाली
पड़ी ज़मीन शामिल नहीं है)।
यह राशि भारत के GDP का 60% से भी ज्यादा है,इसे
भी बढ़ाकर 2025 तक
40,00,000 करोड़ किया जाना है।

Saturday, March 28, 2015

भारत के पास अपना जीपीएस सिस्टम

इसरो ........फिर से चुपके से धमाका किया है इसरो ने..... अपने उपग्रह IRNSS-1D के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत के पास अपना जीपीएस सिस्टम होगा जो १५०० किमी कवर करेगा......जिसका उपयोग सेना के लिए भी होगा.....भारत यह कामयाब हासिल करने वाला अमेरिका के बाद दूसरा देश होगा..........कुछ दिन पहले, पहले ही प्रयास में मंगलयान का मिशन सफल हुआ था.....इसरो के वैज्ञानिकों को शत् शत् नमन....!!

योगदेश्वर मंदिर

यह तस्वीर सह्याद्री पर्वतमाला के मालशेज घाट पर स्थित योगदेश्वर मंदिर की है, इस मंदिर की खूबसूरती देखते ही बनती है क्योंकि यह पहाड़ी से ढके हुए रास्ते के किनारे चट्टानों के नीचे है, इस स्थान से घाटी का दृश्य बेहद ही मनमोहक दिखता है| मानसून में लोग इस स्थान पर विशेषत घूमने आते हैं|

माता वैष्णो देवी की अमर कथा

माता वैष्णो देवी की अमर कथा

वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं।
माता वैष्णो देवी की प्रथम कथा
मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस - पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया।

भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर - पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान - बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं।

इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते - भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया।

भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा' अथवा 'भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी।

माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से 'पिंडों' की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं।

                                                  माता वैष्णो देवी की अन्य कथा

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म की शक्तियों के बढऩे पर आदिशक्ति के सत, रज और तम तीन रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने अपनी सामूहिक बल से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की। यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट रामेश्वर में पण्डित रत्नाकर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। कई सालों से संतानहीन रत्नाकर ने बच्ची को त्रिकुता नाम दिया, परन्तु भगवान विष्णु के अंश रूप में प्रकट होने के कारण वैष्णवी नाम से विख्यात हुई। लगभग 9 वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह मालूम हुआ है भगवान विष्णु ने भी इस भू-लोक में भगवान श्रीराम के रूप में अवतार लिया है। तब वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी।

जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे। तब समुद्र तट पर ध्यानमग्र कन्या को देखा। उस कन्या ने भगवान श्रीराम से उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने को कहा। भगवान श्रीराम ने उस कन्या से कहा कि उन्होंने इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है। किंतुकलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा और तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करुंगा। उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत की श्रेणी में जाकर तप करो और भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर जगत कल्याण करती रहो। जब श्री राम ने रावण के विरुद्ध विजय प्राप्त किया तब मां ने नवरात्रमनाने का निर्णय लिया। इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी, त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी।
 

 

भारत के 9 राम मंदिर जो आपको ज़रूर देखने चाहिए

भारत के 9 राम मंदिर जो आपको ज़रूर देखने चाहिए


1. हरिहर नाथ मंदिर, सोनपुर

हरिहर नाथ मंदिर का निर्माण भगवान राम (त्रेता युग) के हाथों हुआ था. गंगा और गंडक नदी के किनारे अवस्थित यह प्राचीन मंदिर सभी हिन्दुओं के लिए परम पूज्य धार्मिक स्थल है.




2. श्री रामस्वामी मंदिर

यह मंदिर माहे स्थित तिरूवंगद से सिर्फ़ 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. श्री रामस्वामी माहे के प्रमुख व प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है. माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 400 वर्ष पूर्व करवाया गया था.




3. श्री सीता रामचंद्र स्वामी मंदिर, भद्राचलम

श्री सीता रामचंद्र स्वामी मंदिर भगवान राम और उनकी पत्नी देवी सीता को समर्पित है. राम भगवान विष्णु के सातवें अवतार माने जाते हैं. मंदिर भद्राचलम के पवित्र शहर में स्थित है और पर्णशाला गांव से केवल 35 किमी दूर है, जहां भगवान राम ने अपने वनवास के कुछ समय बिताए थे.




4. रामराजा मंदिर, ओरछा

यह मंदिर ओरछा का सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण मंदिर है. यह भारत का एकमात्र मंदिर है जहां भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है.




5. रामेश्वरम्

तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित यह तीर्थ हिन्दुओं के चार धामों में से एक है. इसके अलावा यहां स्थापित शिवलिंग बारह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है. भारत के उत्तर में काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है.




6. पोद्दारेश्वर राम मंदिर

इस मंदिर का निर्माण राजस्थान के पोद्दार परिवार के श्री जमुनाधर पोद्दार ने 1923 ई. में करवाया था. मंदिर में भगवान राम और शिव की प्रतिमाएं स्थापित हैं. राम नवमी को होने वाली राम जन्मोत्सव शोभायात्रा के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं.




7. रामटेक, नागपुर

इस स्थान को रामटेक इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां भगवान राम और उनकी पत्नी सीता के पवित्र चरणों का स्पर्श हुआ था. यहां की पहाड़ी के शिखर पर भगवान राम का मंदिर बना हुआ है, जो लगभग 600 साल पुराना माना जाता है. रामनवमी पर्व यहां बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. संस्कृत कवि कालिदास के मेघदूतम में इस स्थान को रामगिरी कहा गया है.




8. राम मंदिर, आयोध्या

माना जाता है कि इस मंदिर को राजा विक्रमादित्य ने खोजा था? इस जगह को भगवान राम के जन्म का स्थान माना जाता है? यहां एक छोटा सा भगवान राम का मंदिर है?




9. श्री राम मंदिर, त्रिप्रायर

त्रिप्रायर नदी के किनारे स्थित त्रिप्रायर श्री राम मंदिर कोडुन्गल्लुर का प्रमुख धार्मिक स्थान है जो कोडुन्गल्लुर शहर से लगभग 15 किमी. की दूरी पर स्थित है. भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम की इस मंदिर में पूजा की जाती है.


तस्करी के जाल में कैद होती बेटियां....

तस्करी के जाल में कैद होती बेटियां....
"जब मैं 13 साल की थी मैं काठमांडू के होटल में काम करने आई, लेकिन मुझे सीधे मसाज पार्लर ले जाया गया." देह व्यापार के चक्रव्यूह में फंसी सीता तमांग कहती हैं कि शुरुआत में तो उसकी देखभाल की गई, लेकिन एक हफ्ते बाद पार्लर के मालिकों ने उसे बताया कि ग्राहक उससे क्या उम्मीद रखते हैं. "मैं बहुत रोई और मुझे डर लग रहा था. फिर बाकी लड़कियों ने कहा कि उनके साथ भी ऐसा ही हुआ है और इसमें कोई खतरा नहीं है." 18 साल की तमांग लेकिन कभी वापस घर नहीं गई. जब वह छोटी लड़कियों को देखती है तो उसे अपना बचपन याद आता है....
सुंदरबन (पश्चिम बंगाल)। रिंकी महज़ सोलह साल की है पर अपनी उम्र से बहुत ज़्यादा समझदार है। रिंकी उन आठ लड़कियों में से है जिन्हें दो साल तक घर से दूर गुमनामी का जीवन जीने के बाद बचाया गया। रिंकी गाँव से बाहर शहर के एक घर में काम करने गई थी, माता-पिता से संपर्क टूटने के बाद से रिंकी लापता थी....
कुछ समय पहले पहाडग़ंज की उन्हीं गंदी गलियों से पुलिस ने निर्मला नाम की एक और लड़की को भी बचाया था। उसे लड़कियों के एक तस्कर को बेच दिया गया था। बेचने वाला भी और कोई नहीं बल्कि उसी के परिवार का सदस्य था जो उसे अच्छी नौकरी का दिलासा देकर शहर लाया था....
यह कहानियां कुछ ऐसी लड़कियों की हैं जो अलग-थलग, कैद और उपेक्षा का जीवन जीने के बाद भी वापस अपने घर आने में सफल हुईं। हमारे देश भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और पिछड़े इलाको से और पडोसी देश नेपाल , बांग्लादेश मैं से लाखो गरीब लड़कियों को नौकरी का सब्जबाग दिखाकर मानव तस्कर देह की मंडियों में ले जाते हैं । जिनको कोठो पर बेच दिया जाता हैं और कुछ लड़कियों को ये तस्कर वीजा दिलाकर अरब के शेखों के हवाले कर देते हैं। बहुत छोटी उम्र में ही ये लड़कियां देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं. ऐसा नही हैं की यह यह सारी लडकिया तस्करो के द्वारा ही देह व्यापर में लायी जाती हो कई गरीब, गांव के लोग अपनी लड़कियों को को बेच देते हैं. और कुछ मामलों में शादी का लालच देकर बिचौलिये इन्हें चकलाघरों में बेच देते हैं. कम उम्र की बच्चियों में स्टेरॉयड काम नहीं करते, खासकर 12 से 14 की उम्र वाली लड़कियों में. तो लड़कियों को भरा पूरा दिखाने के लिए ओराडेक्सॉन नाम का स्टेरॉयड इस्तेमाल किया जाता है. सामान्य तौर पर ये स्टेरॉयड किसान अपनी गायों को हृष्ट पुष्ट बनाने के लिए करते हैं.यह सच है कि इस कारोबार के प्रति झुकाव के लिए देश की गरीबी और बेरोजगारी के साथ ही सरकारों की गरीब विरोधी नीतियां अधिक जिम्मेदार है, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हकीकत यह है कि कोई भी महिला खुशी-खुशी अपनी इच्छा से इस काम को नहीं अपनाती। बहुआयामी अनवरत शोषण और रोजगार की विकल्पहीनता ही उन्हें मजबूरन इस कर्म की ओर खींचकर ले आती हैं।
"बचपन बचाओ आंदोलन\" की ओर से हाल ही जारी किए गए आंकड़े हमें शर्मसार कर देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 1 साल से कुछ अधिक समय मैं एक लाख 70 हजार से अधिक बच्चे लापता हुए हैं। इनमें से अधिकतर बच्चों का देह व्यापार और बाल मजदूरी के लिए अपहरण किया गया है। बच्चियों को देह व्यापार में झोंक दिया जाता है और लड़कों से या तो जबरन मजदूरी कराई जाती है या फिर उनके अंग निकाल कर उन्हें बेच दिया जाता है।
90,000 बच्चे खो जाते हैं हर साल भारत में, इनमें से 30,000 की ही हो पाती है तलाश।
11 बच्चे हर घंटे में गुम हो जाते हैं देश में।
40 लाख बच्चे हैं सिर्फ घरेलू सेवाओ में।
33 अरब डॉलर का है बच्चों की तस्करी का व्यापार

मोदी जी द्वारा गोद लिया बनारस का जयापुर गांव

ये नज़ारा है मोदी जी द्वारा गोद लिया बनारस का जयापुर गांव का जहाँ दलितों के लिए मकान बनकर तैयार हो गये हैं,आजादी के बाद पहली बार इस गांव तक पक्की सड़क का निर्माण हुआ है,मुझे पूरा विश्वास है यही नजारा अगले १० वर्षो में देश के हर गांव का होगा।

Thursday, March 26, 2015

नवसारी का चिखली बना देश का पहला आदर्श गांव |

नवसारी का चिखली बना देश का पहला आदर्श गांव |
गुजरात के नवसारी से भाजपा सांसद सीआर पाटिल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आदर्श गांव योजना को सबसे पहले जमीन पर उतार दिया है। पाटिल ने तीन गांव आदर्श गांव बनाने के लिए गोद लिए थे। इनमें से एक चिखली आदर्श गांव बनकर तैयार हो गया है, पाटिल ने मात्र चार माह में यह कमाल किया है।
चिखली गांव को देखने गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल कुछ दिनों पहले यहां आकर सांसद को बधाई दे चुकी हैं। हाल ही में दिल्ली के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी चिखली गांव की सार्वजानिक रूप से प्रशंसा कर चुके हैं।

उपयोगी जानकारी " रेलवे"!

उपयोगी जानकारी !
ट्रेन में बेफिक्र होकर सोएं, डेस्टिनेशन स्टेशन आने पर जगा देगा रेलवे अगर आप रात के समय ट्रेन में सफर कर रहे हैं। रात में ही आपका डेस्टिनेशन स्टेशन आएगा, तो आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। बेफिक्र होकर सोएं, क्योंकि अब आपका डेस्टिनेशन स्टेशन आने से पहले जगाने की जिम्मेदारी रेलवे की होगी। लेकिन इसके लिए आपको 139 पर फोन कर वेकअप कॉल-डेस्टिनेशन अलर्ट सुविधा अपने पीएनआर पर एक्टिवेट करवाना होगी।
ट्रेन में रात के समय सफर करने वाले यात्रियों को डेस्टिनेशन स्टेशन आने से पहले उठने में काफी परेशानी आती है। कई बार यात्री डेस्टिनेशन स्टेशन आने पर उठ नहीं पाते और ट्रेन आगे निकल जाती है। इससे बहुत परेशानी झेलना पड़ती है।
इस परेशानी के निराकरण के लिए रेलवे ने वेकअप कॉल-डेस्टिनेशन अलर्ट सुविधा शुरू कर दी है। यह नई सुविधा कुछ ही दिन पहले ही शुरू हुई है, लेकिन प्रचार-प्रसार की कमी के कारण कई लोगों को इसकी जानकारी नहीं है।
इस सुविधा को डेस्टिनेशन अलर्ट नाम दिया गया है।
सुविधा को एक्टिवेट करने पर डेस्टिनेशन स्टेशन आने से पहले ही मोबाइल पर अलार्म बजेगा।
सुविधा को एक्टिवेट करने के लिए अलर्ट टाइप करने के बाद पीएनआर नंबर टाइप करना होगा और 139 पर भेजना होगा।
139 पर कॉल करना होगा। कॉल करने के बाद भाषा चुने और फिर 7 डायल करें। 7 डायल करने के बाद पीएनआर नंबर डायल करना होगा। इसके बाद यह सेवा एक्टिवेट हो जाएगी
इस सुविधा को वेकअप कॉल नाम दिया गया है।
रिसीव होने तक बजेगी मोबाइल की घंटी
इस सेवा को एक्टिवेट करने पर स्टेशन आने से पहले मोबाइल की घंटी बजेगी। यह घंटी तब-तक बजती रहेगी, जब तक आप फोन रिसीव नहीं करेंगे। फोन रिसीव होने पर यात्री को सूचित किया जाएगा कि स्टेशन आने वाला है।

सम्राट अशोक जयंती -26 मार्च 2015

हर भारतीय को शर्म आना चाहिए!
1. जिस राजा का चक्र राष्ट्रीय ध्वज में है।
2. जिस राजा के चार सिंह मुखी के चिन्ह को राष्टीय मुद्रा माना जाता है।
3. जिस राजा को दुनिया का सर्वोत्तम राजा माना गया।
4. जिस राजा के कारण भारत का नाम पूरी दुनिया में उज्ज्वल हुआ।
5. जिसके नाम से सर्वोच्च पुरुस्कार अशोक चक्र दिया जाता है।
6. जिस राजा का साम्राज्य अफगानिस्तान और ईरान तक फैला था।
7. भारत का पहला प्राणी चिकित्सालय जिसके शासन में खुला।
8. पर्यावरण के प्रति जागरूकता अभियान का सर्व प्रथम जिस राजा ने शुरू किया।
9. जिस राजा के कारण बौद्ध धम्म विश्वव्यापी हुआ।

उस महान चक्रवर्ती राजा को प्रियदर्शी सम्राट अशोक के नाम से पूरी दुनिया मानती है।
उस महान अशोक की जयंती भारत में नही मनाई जाती ?
(सम्राट अशोक जयंती -26 मार्च 2015)

इंडिया वर्ल्ड कप की रेस से बाहर हो गया..

सोचा था क्या देखो यह क्या हो गया, इंडिया वर्ल्ड कप की रेस से बाहर हो गया..
ऐसा क्या हुआ की इंडिया के हाथो से आज का मैच फिसल गया, जाने अनजाने में एक सुनहरा मौका जैसे निकल गया..
आज टीवी के सामने बैठे लोगो ने अपना समय बर्बाद किया, आज इंडियन टीम ने सभी भारतवासियो को खूब निराश किया..
धोनी जी क्या हुआ आपकी टीम को आज, कुछ तो बताइये आज की हार का राज़ ??
आज इंडिया सेमी फाइनल बुरी तरह है हारी, ऑस्ट्रेलिया की टीम पड़ी आपकी सेना पर बड़ी भारी..
ऑस्ट्रेलिया ने 328 रन बनाकर किया ऐसा कमाल., इंडिया टीम का देखो कर दिया धोती फाड़कर रूमाल..
बड़ी शान से यहा तक पहुचे थे मेन इन ब्लू, क्या हुआ इन सब धुरंदारो को आज मेरे गुरु..
आज फिस्सडी की तरह पूरी इंडियन टीम है खेली, कैसे आज तक हर मैच जीती यह एक बहुत बड़ी है पहेली..
आज एक एक कर सभी जल्दी ही आउट हो गये, देखो कैसे वर्ल्ड कप की रेस से आउट हो गये..
बहुत उम्मीद थी लोगो की भारत सेमी फाइनल जीतेगी , एक बार फिर वर्ल्ड कप जीत अपने घर लौटेगी..
जितने वाला मैच देखो इंडिया ने कैसे अपने हाथो से गवाया, देश की करोड़ो की जनता को बहुत दुख पहुचाया..
करोड़ो भारतीयो की आस्था को इन्होने ठेस पहुचाई, ऑस्ट्रेलिया के सामने इंडिया टीम आज टिक नही पाई..
आज फिर दोहराया गया भारतीय क्रिकेट का इतिहास, हर एक भारतीय के दिल में चार सालो तक रहेगी यह खटास..
चलो सब कुछ भूल कर हम सभी अपने काम पर लगे, आज थोड़ा बहुत मेहसूस कर रहे है ठगे ठगे......

इजराइल - एक संक्षिप्त परिचय


इजराइल - एक संक्षिप्त परिचय

14 मई, 1948 को इजराइल ने अपनी आजादी की घोषणा की। इसके चौबीस घंटे के अंदर मिस्र, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की फौजों ने इजराइल पर हमला कर दिया। लिहाजा, अपने पूर्वजों की धरती पर फिर से संप्रभु देश बने इजराइल को अपनी रक्षा के लिए कार्रवाई करनी पड़ी।

यह लड़ाई रूक-रूक कर कोई सवा साल तक चली। नवगठित इजराइली फौज ने पूरे साजो-सामान के बगैर भी बहादुरी से संघर्ष किया और आखिरकार हमलावरों को पीछे धकेल दिया। इस युद्ध में 6000 से भी ज्यादा इजराइली जानें गईं। यह संख्या तब की इजराइली आबादी की करीब एक फीसदी थी। इस युद्ध को इजराइल के स्वतंत्रता-संघर्ष का नाम दिया गया।

1949 के शुरूआती महीनों में संयुक्त राष्ट्र संघ के सौजन्य से इजराइल और प्रत्येक हमलावर देश के बीच सीधी वार्ता शुरू हुई। सिर्फ इराक ने वार्ता करने से इन्कार कर दिया। बहरहाल, वार्ता करने वाले देशों के साथ समझौते किए गए जिसमें युद्ध की समाप्ति की स्थिति परिलक्षित होती थी।

युद्ध समाप्त हुआ। अब इजराइल ने लम्बे संघर्षों के बाद हासिल अपनी आजादी को सींचने और संवारने का काम शुरू किया। 25 जनवरी, 1949 को पहला राष्ट्रीय चुनाव हुआ। करीब 85 फीसदी नागरिकों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया और 120 सदस्यीय कनेसेट (संसद) का चुनाव किया।

इजराइल देश बनाने में जिन दो लोगों ने नेतृत्व प्रदान किया था, वे आजादी के बाद भी नेता बने रहे। यहूदी एजेंसी के प्रमुख डेविड बेन-गुरियन को पहला प्रधानमंत्री चुना गया और वर्ल्ड जिमनास्ट आर्गेनाइजेशन के प्रमुख खाइम वाइजमैन को संसद ने पहला राष्ट्रपति चुना। 11 मई, 1949 को इजराइल संयुक्त राष्ट्र संघ का 55 वां सदस्य-देश बना।

इजराइल के अस्तित्व में आने के पीछे निर्वासितों के एकत्र होने' की अवधारणा थी। इसी अवधारणा के तहत इजराइल ने अपने दरवाजे खोल दिए - दुनिया भर में फैले हर यहूदी को यह अधिकार दिया गया कि वे इजराइल आएँ और नागरिकता हासिल करें। आजादी के महज चार महीने के अंदर करीब 50 हजार यहूदी आए इनमें से ज्यादातर वे थे जो नाजी यातना शिविर से बच गए थे।
1951 के अंत तक कुल 6 लाख 87 हजारस्त्री-पुरुष-बच्चे इजराइल आए। इनमें से तकरीबन तीन लाख वे लोग थे जो अरब देशों से शरणार्थी के रूप में आए थे।
स्वतंत्रता संग्राम के खर्च और तेजी से बढ़ती आबादी ने देश की अर्थ-व्यवस्था पर गहरा दबाव डाला। इसका सामना करने के लिए देश ने मितव्ययता और विदेशी मदद का सहारा लिया। अमेरिकी सरकार द्वारा दी गई मदद, अमेरिकी बैंको द्वारा दिए गए कजर्, प्रवासी यहूदियों द्वारा दी गई दान-राशि और जर्मनी से प्राप्त क्षति-राशि का इस्तेमाल विकास-कार्यों के लिए किया गया। नए घर बनाए गए, कृषि का मशीनीकरण किया गया, व्यापारिक बेड़े बनाए गए, राष्ट्रीय एयरलाइन खड़ी की गई, उपलब्ध खनिजों का दोहन किया गया, उद्योगों का विकास किया गया और सड़क, बिजली व दूर-संचार का नेटवर्क तैयार किया गया।

पहले दशक की समाप्ति तक औद्योगिक उत्पादन दोगुना हो गया और कामगारों की तादाद भी दोगुनी हो गई। औधोगिक निर्यात चौगुना हो गया। विशाल भू-क्षेत्र को कृषि के अंतर्गत लाया गया। 50 हजार एकड़ से भी ज्यादा बंजर इलाके में वनीकरण किया गया। करीब 800 किलोमीटर लंबे हाइवे के दोनों ओर पौधे लगाए गए। इन प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि मांस और अनाज को छोड़ कर बाकी खाद्य पदार्थों के मामले में देश आत्मनिर्भर हो गया।

देश बनने के पूर्व यहूदी समुदाय ने जिस शिक्षा-प्रणाली को विकसित किया था, उसे अब बड़े पैमाने पर लागू किया गया। पांच से चौदह साल के बच्चों के लिए शिक्षा निःशुल्क और अनिवार्य कर दी गई। सन्‌ 1978 से 16 साल की उम्र तक शिक्षा अनिवार्य और 18 साल की उम्र तक मुफ्त कर दी गई है। सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियाँ खूब फली-फूलीं। इसमें मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी तत्वों का संगम था। दुनिया के कोने-कोने से आए यहूदियों ने न सिर्फ अपने समुदाय की खास परंपराओं को, बल्कि उन स्थानों की संस्कृति को भी साथ लाया जहाँ वे पीढ़ियों से बसे हुए थे। जब इजराइल ने अपनी दसवीं सालगिरह मनाई तो उसकी आबादी 20 लाख को पार कर चुकी थी।

यूजेर बेन-येहुदा (1858-1922) ने हिब्रू को बोली जाने वाली भाषा के रूप में विकसित करने की मुहिम छेड़ी। सन्‌ 1881 में इजराइल की धरती पर आने के बाद उन्होंने लोगों के घरों और स्कूलों में हिब्रू भाषा के प्रयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने हजारों नए शब्द गढ़े और हिब्रू भाषा में दो पत्रिकाओं की शुरूआत की। उन्होंने हिब्रू भाषा समिति (1896) के पुनर्गठन में भी सहयोग किया। उन्होंने सन्‌ 1910 में प्राचीन और आधुनिक हिब्रू भाषा का शब्द-कोच्च बनाने का कामभी छेड़ा। कुल 17 अंको के इस शब्द-कोच्च के कई अंक उन्होंने खुद तैयार किए। उनके बाद उनकी दूसरी पत्नी और बेटे ने मिल कर यह काम जारी रखा और 1959 तक संपन्न किया।

कैसे माना जावे कि दूरबीन का आविष्कार गैलीलियो ने किया?

जो मंदिर पूरा का पूरा गैलीलियो के जन्म से पांच सौ साल पहले बन गया था
जिसमे यह दूरबीन के प्रयोग का चित्र देखे
अब यह कैसे माना जावे कि दूरबीन का आविष्कार गैलीलियो ने किया?
नास्त्रेदम की भविष्य वाणियों को जोर जोर से दोहराने वाले तथा उसका अपनी सुविधा से अर्थ करने वाले पश्चिमी सभ्यता के अनुगामी
जरा अपने ही पुराणो को पढ़ लो थोडी संस्कृत सीख लो
जहा तक आधुनिक विज्ञान आज तक नहीं पंहुचा है
उसे समझ नहीं आ रहा है
वहा तक तो वे अंग्रेजी लेखको की काल गणना को मान ले तो भी वे पुराण आज से 1000 से 2000 वर्ष पहले लिखे गए
जब आधुनिक विज्ञान का जन्म नहीं हुया था
उनमे लिखी बाते तो झूठी और तुम्हारी बाते सत्य।
गैलीलियो का यह परिचय विकिपीडिया पर दर्ज है
इस महान विचारक का जन्म आधुनिक इटली के पीसा नामक शहर मे एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। आधुनिक इटली का शहर पीसा 15 फ़रवरी 1564 केा महान वैज्ञानिक गैलीलियो गैली के जन्म को भी ईश्वर की रचना का दोष मानकर ऐतिहासिक भूल कर बैठा था। गैलीलियो के द्वारा प्रतिपादित सिंद्वांतो से धार्मिक मान्यताओं का खंडन होता था जिसके लिये गैलीलियो को ईश्वरीय मान्यताओं से छेडछाड करने के लिये सारी उम्र कारावास की सजा सुनायी गयी। इनके पिता विन्सौन्जो गैलिली उस समय के जाने माने संगीत विशेषज्ञ थे। वे ‘ ल्यूट ’ नामक वाद्य यंत्र बजाते थे, यही ल्यूट नामक यंत्र बाद में गिटार और बैन्जो के रूप में विकसित हुआ। अपनी संगीत रचना के दौरान विन्सौन्जो गैलिली ने तनी हुयी डोरी या तार के तनाव और उससे निकलने वाले स्वरों का गहनता से अध्ययन किया तथा यह पाया कि डोरी या तार के तनाव और उससे निकलने वाली आवाज में संबंध है। पिता के द्वारा संगीत के लिये तनी हुयी डोरी या तार से निकलने वाली ध्वनियों के अंतरसंबंधों के परिणामों का वैज्ञानिक अध्ययन उनके पुत्र गैलीलियो द्वारा किया गया। इस अध्ययन को करने के दौरान बालक गैलीलियो के मन में सुग्राहिता पूर्ण प्रयोग करते हुये उनके परिणामो को आत्मसात करने की प्रेरणा प्रदान की। इनको परीक्षा मूलक (प्रयोगात्मक) विज्ञान का जनक माना जाता है। इन्होंने दोलन का सूत्र का प्रतिपादन किया। इन्होंने दूरबीन का आविष्कार किया। उसने दूरदर्शी यंत्र को अधिक उन्नत बनाया। उसकी सहायता से अनेक खगोलीय प्रेक्षण लिये तथा कॉपरनिकस के सिद्धान्त का समर्थन किया। उन्हें आधुनिक प्रायोगिक खगोलिकी का जनक माना जाता है

इस से पहले भारतीय ज्योतिष वेत्ता ग्रह की गति उसके प्रभाव ग्रहण आदि की गणना कर चुके थे
रहा सवाल दूरबीन बनाने का तो नीचे एक शिल्प है
जो कर्णाटक के बेलूर में चिन्ना केशव स्वामी के मंदिर में है
जो मंदिर पूरा का पूरा गैलीलियो के जन्म से पांच सौ साल पहले बन गया था
जिसमे यह दूरबीन के प्रयोग का चित्र देखे
अब यह कैसे माना जावे की दूरबीन का आविष्कार गैलीलियो ने किया

Wednesday, March 25, 2015

ये हैं दुनिया की 10 शक्तिशाली आर्म्ड फोर्सेज़


1.युनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका

विश्व का सबसे अमीर देश अमेरिका अपनी पूंजी का एक बड़ा हिस्सा अपने रक्षा बजट पर लगाता है. इसकी सेना में लगभग 1,369,532 लोग लगातार देश की रक्षा कर रहे हैं.



2. रूस

पिछले दो दशकों से तकनीक के मामले में रूस ने अपनी अच्छी पकड़ बना ली है. रूस ने अपनी सेना को मजबूत बनाने के लिए विज्ञान की सहायता लेनी सबसे पहले शुरू की थी. आज रूस की रक्षा करने के लिए लगभग 766,000 सैनिक तैनात हैं.



3. चीन

लोगों का कहना है कि चीन की सेना सबसे शक्तिशाली है. पर दोस्त, ऐसा नहीं है! वैसे ये सब नंबरों का खेल है. चीन की जनसंख्या ज़्यादा होने की वजह से ऐसा कहा जाता है. चीन के पास “मैन पॉवर” सबसे ज़्यादा है. चीन की सेना में लगभग 2,285,000 सैनिक काम कर रहे हैं. चीन सरकार लगातार देश का रक्षा बजट बड़ा रही है. इससे चीन के पड़ोसियों को चिंतित होने की ज़रूरत है.



4. भारत

भारत ने ख़ुद में बहुत से सुधार किये हैं. आज़ादी के बाद से भारतीय सेना ने बहुत तेज़ी पकड़ी है. बजट से लेकर सेना में लोगों की भागीदारी तक सब में बढ़ोतरी हुई है. भारत जनसंख्या के मामले में दूसरे नंबर पर आता है. तकनीक की सहायता से भारतीय सेना ने बड़े-बड़े आयाम स्थापित किये हैं. भारतीय सेना में लगभग 1,325,000 लोग अपनी सेवाएं दे रहे हैं.



5. द युनाइटेड किंगडम

लगभग पूरी दुनिया पर राज कर चुकी ब्रिटिश सेना आज पांचवे नंबर पर आ चुकी है. वैसे इसका कारण व्यवस्थायें हैं. ब्रिटिश सेना में फ़िलहाल 198,810 लोग अपनी सेवाएं दे रहे हैं.



6. फ्रांस

सन 2013 में फ्रांस ने अपनी सेना को मजबूत करने के लिए कदम उठाये. फ्रांस ने अपनी सेना में न्यूक्लिर को काफ़ी महत्व दिया है. फ्रांस की सेना में 222,215 लोग काम कर रहे हैं.



7. जर्मनी

माना कि अर्थव्यवस्था के मामले में जर्मनी की हालत दूसरे मुल्कों के मुकाबले ठीक नहीं है, लेकिन वहां की सेना आज भी मुकाबले में टिकी पड़ी है. फ़िलहाल जर्मनी में 182,620 सैनिक हैं.



8. तुर्की

फ़िलहाल तुर्की के हाल खस्ताहाल हैं. देश की सेना लगातार आईएस (आतंकी संगठन) से दो-दो हाथ करने में लगी हुई है. तुर्की ने अपनी सेना संगठनों में बहुत से बदलाव किए हैं. तुर्की का मतभेद पड़ोसी देश सीरिया से लगातार चल रहा है. तुर्की ने अपनी सेना के बजट में भी 10 प्रतिशत तक का इज़ाफा किया है. तुर्की की सेना में 664,049 लोग हैं.



9. साउथ कोरिया

आंतरिक दिक्कतों के चलते साउथ कोरिया के हालात थोड़े ठीक नहीं चल रहे, हालांकि नॉर्थ कोरिया के साथ भी मामला बिगड़ता-सा जा रहा है. साउथ कोरिया के संबंध नॉर्थ कोरिया के साथ ही नहीं बल्कि जापान और चीन के साथ भी लगातार खराब होते जा रहे हैं. पिछले साल इसने रक्षा बजट को बढ़ा दिया था, आपको जान कर हैरानी होगी कि इस देश की एयर फोर्स विश्व में छठे स्थान पर है. तकनीक के मामले में भी यहां की सेना ने महारथ हासिल कर रखी है.



10. जापान

ये तो आप जानते ही हैं कि जापान अपनी आर्मी के लिए नहीं बल्कि अपनी तकनीक के लिए जाना जाता है. जापान के मतभेद चीन के साथ एक लंबे अरसे से चल रहे हैं. जापान की सेना को हल्के में नहीं लिया जा सकता. जापान की सेना ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार बदलाव किये हैं. आये दिन निकल रही नई-नई तकनीकों के बाद ये विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब होती है.



मेरा मकसद इन देशों की शक्ति को कम आंकने या ज़्यादा आंकने का नहीं है. हम हर सैनिक की इज़्ज़त करते हैं और हर देश को सलाम.

वर्षों बाद एक नेता को भारत बनाते देखा है

" हालात.ए.मुल्क देख के रोया न गया...
कोशिश तो की पर मूंह ढक के सोया न गया".
देश मेरा क्या बाजार हो गया है ...
पकड़ता हु तिरंगा तो लोग पूछते है कितने का है...
वर्षों बाद एक नेता को माँ गंगा की आरती करते देखा है,
वरना अब तक एक परिवार की समाधियों पर फूल चढ़ाते देखा है।
वर्षों बाद एक नेता को अपनी मातृभाषा में बोलते देखा है,
वरना अब तक रटी रटाई अंग्रेजी बोलते देखा है।
वर्षों बाद एक नेता को Statue Of Unity बनाते देखा है,
वरना अब तक एक परिवार की मूर्तियां बनाते देखा है।
वर्षों बाद एक नेता को संसद की माटी चूमते देखा है,
वरना अब तक इटैलियन सैंडिल चाटते देखा है।
वर्षों बाद एक नेता को देश के लिए रोते देखा है,
वरना अब तक "मेरे पति को मार दिया" कह कर वोटों की भीख मांगते देखा है।
पाकिस्तान को घबराते देखा है, अमेरिका को झुकते देखा है।
इतने वर्षों बाद भारत माँ को खुलकर मुस्कुराते देखा है।

!! फिर गयी दुहाई प्रताप की अहमदाबाद में !!

!! फिर गयी दुहाई प्रताप की अहमदाबाद में !!
!! अपने जन्म दिन पर बलिदानी वीरों, क्रांतिकारियों को समर्पित यह उत्साहप्रद ऐतिहासिक कथा !!
प्रताप को अपना संघर्ष चलाते रहने के लिए धन की तीव्र आवश्यकता थी !
मेवाड़ में तो सुरक्षा दृष्टि से खेती को ही प्रतिबन्धित का दिया गया था !
न जनता मैदानों में रहेगी, न खेती करेगी तो आक्रमणकारियों को भी खाने को नहीं मिलेगा !
इसी नीति की परिपालना के कारण ही अकबर की मानसिंह नीत सेना गोगुन्दा में भूखी मर गयी थी और छोड़ भागी थी अपनी जान बचाने को !
मेवाड़ की जनता और कुछ कमाई का धन्धा भी नहीं कर पाती थी !
लगातार स्थान स्थान पर शत्रु से लड़ते भिड़ते रहना पड़ता था !
इस के अतिरिक्त -
चारों ओर पहरा देना,
दूर दूर के समाचार लाना और ले जाना
और
प्रताप और अन्य सेनाधिकारियों व सैनिकों के परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने का कार्य भी इनको करते रहना पड़ता था !
एक प्रकार से अघोषित आपातकाल लगा हुआ था पूरे मेवाड़ में !
पूरा राज्य ही सैनिक बना हुआ था !
तब वेतन देने के लिए तो कोई धन की आवश्यकता नहीं थी !
किन्तु शस्त्रास्त्र के लिए तो धन चाहिए ही था !
मेवाड़ में तो धन था नहीं !
और न जनता को अवकाश था धन कमाने के लिए !
अतः धन की तीव्र आवश्यकता थी !
प्रताप ने इसकी भी व्यवस्था की हुई थी !
इसी की एक कहानी है यह -
'' फिर गयी दुहाई प्रताप की ''
अहमदाबाद पर अकबर ने कब्जा कर लिया था !
समुद्री मार्ग से होने वाले व्यापार पर अकबर ने अपना पंजा कस रखा था !
वहीं पर धावा बोला प्रताप की सेना ने !
अकबर की सेना मेवाड़ में लूटपाट करती थी तो प्रताप ने भी अकबर को दुर्बल करने और दुर्बल सिद्ध करने की लिए अकबर अधिकृत क्षेत्रों में प्रत्याक्रमण और लूटपाट की यशस्वी योजना लागू की !
एक दिन अहमदाबाद की जनता निश्चिन्त सोई हुई थी !
सूर्य नारायण ने आकाश में पदार्पण किया ही था !
आकाश देवता भगवा रंग से विभूषित हो रहे थे
और मूर्ख मुग़ल सैनिक छावनी का हरा झण्डा लहराने में लगे हुए थे
कि अकस्मात्
'' एकलिंगनाथ की जय ''
का आकाश-नादित घोर नाद सुनाई दिया !
झण्डा लहराने लगे सैनिक टुकड़ी के कुछ सैनिक हल्दी घाटी युद्ध में रहे थे
और
'' एकलिंगनाथ की जय ''
इस महा वाक्य का चमत्कार देख चुके थे !
मोलेला ग्राम की छावनी से बनास नदी को पार कर अकबर की विशाल अजगरी सेना अहंकार मद में चूर हुई धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी !
ख्वाजा साहब से लेकर मोलेला तक कोई भी प्रतिरोध नही हुआ था !
अकबर के सेनानायकों ने अपने सैनिकों में प्रवाद फैला रखा था कि प्रताप तो पहाड़ी चूहा है ! पहाड़ के किसी बिल में घुसा हुआ है ! बस उसे ढूंढ कर एक पिंजरे में बंद करेंगे और जहाँपनाह के दरबार में पेश करेंगे !
बड़े अहंकार में थी अकबर की सेना !
चली जा रही थी मदमाती हुई !
आ गयी बड़ी सकड़ी घाटी !
एक ही एक बार में घुस सके इतनी सकड़ी !
वहीं पर पहली बार सुना था इन मुगलों ने
'' एकलिंगनाथ की जय ''
का उद्घोष !
जिसे वे चूहा समझ रहे थे, वह चूहा नही था, वह तो सिंह निकला !
सबसे पहले अपने धवल श्वेत रंग के घोड़े पर
'' एकलिंगनाथ की जय ''
बोलता हुआ वही निकला था उस सकड़ी घाटी में से !
बस फिर तो चमत्कार हो गया,
न जाने चारों और के पहाड़ों में से कितने ही
'' एकलिंगनाथ की जय ''
बोलने वाले निकल आये और टूट पड़े मुग़ल सेना पर !
जाने कोई भूत ही जाग गए हों पहाड़ों में !
भागना पड़ गया मुग़ल सेना को !
जिधर जो जहां भागे उधर वहां भी
'' एकलिंगनाथ की जय ''
बोलने वाले और तीर, भाले, भाटे बरसाने वाले प्रकट होते रहे !
कोई छह कोस भागे तब जान बची !
आज वे झण्डा चढ़ा रहे थे कि
'' एकलिंगनाथ की जय ''
का बहुतों के द्वरा उच्चारित उच्चस्वर सुनाई दिया !
वे झण्डा चढ़ाना भूल गए !
भाग जाने और जान बचाने में ही उन्होंने अपनी भलाई समझी !
प्रताप के सैनिक भी न जाने किस माटी के बने हुए थे,
न जाने क्या पाटी पढ़े हुए थे कि आक्रमण भी छावनी में वहां किया जहां झण्डा चढ़ाया जा रहा था !
अकबर के फौजी झण्डा अधबिच में छोड़ भागे,
चिल्लाते भी गए -
'' भागो, भागो प्रताप आ गया है ! ''
प्रताप के सैनिक तो सचमुच में चमत्कारी थे !
वे एक स्थान पर नहीं तो छावनी में कई स्थानों पर प्रकट हुए !
बीसियों स्थानों पर
'' एकलिंगनाथ की जय ''
का घोर उद्घोष हुआ और उन सभी स्थानों पर वही हुआ जो ध्वज-स्थान वालों का हुआ था !
सभी ओर
'' भागो, भागो प्रताप आ गया है ''
गूंजने लगा !
कोई बेवकूफ प्रतापी सेना के सामने आया तो वह मेवाड़ी तलवार का कलेवा बन गया !
सारी छावनी उद्ध्वस्त हो गयी !
'' प्रताप आ गया है '' और '' भूत आ गया है '' में अन्तर ही किसी को समझ में नहीं आया !
प्रताप की सेना अकबर का खजाना एकत्र करने लगी !
प्रताप की सेना अपने काम में लगी ही थी कि अहमदाबाद के दो तीन बड़े सेठ वहां पर आ नत-मस्तक हुए !
'' खमा घणी सेठ भामाशाह जी, जय एकलिंग, जय जिनेन्द्र !''
उन सेठों ने कहा !
वास्तव में प्रताप वहां नहीं थे !
प्रताप की सेना भामाशाह के नेतृत्व में अहमदाबाद अभियान पर गयी थी !
विभिन्न स्थानों पर विभिन्न सेनानायकों के नेतृत्व में प्रतापी सेना अकबरी क्षेत्र में अभियान करती रहती थी !
इससे अनेक लाभ होते थे !
अकबर की सेना का मनोबल टूटता था और अकबर अधिकृत हिन्दू जनता में आशा और विश्वास का संचार होता था !
अहमदाबाद में प्रताप की सेना का यह आक्रमण अप्रत्याशित था !
पूर्णतः सुरक्षित छावनी के बुझदिल अकबरी फौजी अनेक वर्षों से कभी लड़े ही नहीं थे !
इतनी दूर प्रताप की सेना आ जायेगी, यह तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था !
खा खा कर मोटे हुए उन फौजियों से न तो भागा गया और न लड़ा गया !
जो कोई दोजख नसीन हुए, उनको छोड़ कर
और जो भाग खड़े होने में सफल हुए, उनको छोड़ कर बहुतेरे शण्ड-मुसण्ड मरियल अकबरी फौजी गिरफ्त में आ गये !
इन फौजियों ने फहले अनेक हिन्दुओं को गिरफ्तार किया हुआ था
उन सब लाचार हिन्दुओं से बेगार कराई जाती थी !
अब उलटा हो गया !
गिरफ्तार मुग़ल फौजी ही छावनी के गुप्त स्थानों से धन और हिन्दू जनता से लूट लूट कर भरा हुआ सोने चांदी के आभूषणों के भण्डारों को ढूंढ ढूंढ कर लाने की बेगार कर रहे थे, अपनी जान बचाने के लिए !
हिन्दू बेगारी तो अब स्वतंत्र हो गए !
भामाशाह ने उनको कहा कि फौजियों का खाना खाओ
और अपने अपने गाँव जाओ,
और सब को बताते जाना कि -
महाराणा प्रताप की मुक्ति सेना ने तुम सब को मुक्त कर दिया है !
भामाशाह ने उनको यह भी कहा कि तुम लोगों ने जितने दिन यहां बेगार की,
उतने दिन का वेतन इस धन के ढेर में से अपने आप उठा ले जाओ
जितना चाहो उतना ले जाओ !
किन्तु वे नव स्वतन्त्र हुए हिन्दू नागरिक मोह-माया और लालच से तो पहले ही स्वतन्त्र थे !
वे भामाशाह के चरणों में गिर पड़े
और बोले -
हे हिन्दू राष्ट्र के सजग प्रहरी !
हमारी देहों पर तो अकबर के फौजियों का कब्जा था,
किन्तु हमारी आत्मा पर उनका अधिकार न कभी हुआ है और न भविष्य में हो सकता है !
हिन्दू राष्ट्र के लिए काम आने वाले धन को हम न छुएंगे !
एक बार हम घर वालों को मिल कर आजायें,
फिर हम भी महाराणा की सेवा में उपस्थित होंगे
और हम भी मातृभूमि की निशुल्क, निःस्वार्थ सेवा में लगेंगे !
भगवान एकलिंगनाथ जी और
महाराणा प्रताप की जय जय कार करते हुए वे मुक्त हुए बन्धक
अहमदाबाद की विभिन्न गलियों बाजारों में से अपने गाँवों की ओर निकले !
इन से ही नगरवासियों को पता चला कि प्रताप की प्रतापी मुक्ति सेना ने मुग़ल छावनी को समूल नष्ट कर दिया है
अर्थात्
अहमदाबाद को मुक्त करा दिया है !
इस समाचार से अवगत हो कर ही वे दो तीन बड़े सेठ जो भामाशाह से पूर्व से परिचित थे और जिनसे हिन्दू राष्ट्र का गुप्त सम्पर्क चलता रहता था,
वे दौड़ कर छावनी आये और भामाशाह से सम्पर्क किया !
उनके पहुंचते पहुंचते और भी अन्य नागरिक व सेठ-गण आ उपस्थित होने लगे !
छावनी का आकाश जय जय कारों से गूँज गया !
कुछ उत्साही युवकों ने धरती पर गिर पड़ा हुआ शाही हरा झण्डा पैरों से कुचल दिया और अपने साथ लाया हुआ भगवा झण्डा बड़े प्यार और अधिकार के साथ लहरा दिया !
जो भी वहां आया वह खाली हाथ नहीं आया !
कोई मुक्ति सैनिकों के लिए भोजन लाया,
कोई छाछ-राबड़ी लाया,
कोई फल-फूल लाया,
कोई गुलाल लाया,
कोई फटाके धमाके लाया,
कोई धन आभूषण लेकर आया,
सब चाह रहे थे कि मुक्ति सेना मेवाड़ के लिए लौटे तो उनके मोहल्ले में हो कर निकले !
भामाशाह ने भी सब की लाज रखी !
पूरे अहमदाबाद में ही घूम गयी विजयी प्रतापी सेना जयकारों और रंग-गुलाल के बीच
अपने एकलिंगनाथ जी महाराज के विश्व-विजयी झण्डे के साथ !
थोड़े ही समय में पूरा नगर भगवा पताकाओं और जयकारों से पट गया था !
दुहाई फिर गयी चारों ओर महाराणा प्रताप की !
सब को लग रहा था कि
अब हमारा नगर अहमदाबाद नही है,
फिर से
पवित्र '' कर्णावती '' नगर हो गया है !
इतिहास बताता है कि भामाशाह ने इस विजयी अभियान के फल स्वरूप अहमदाबाद से दो करोड़ रुपयों का धन लाकर महाराणा प्रताप को समर्पित किया !
आज उसका मूल्य आंकना भी कठिन है !
और इसका परिणाम यह भी हुआ कि अहमदाबाद की ओर से कभी भी कोई मुग़ल अभियान मेवाड़ तो क्या राजस्थान के किसी भी क्षेत्र की ओर नहीं हुआ !
'' एकलिंग नाथ महाराज की जय ''
'' कालिका माता की जय ''
'' भारत माता की जय ''

ये 20 चीजें खाने से बिना पसीना बहाए ही पेट अंदर हो जाता है....

ये 20 चीजें खाने से बिना पसीना बहाए ही पेट अंदर हो जाता है
1) दालचीनी ( CINNAMON ) मसाले के रूप में काम मे ली जाती है। यह पेट रोग, इंफ्यूएंजा, टाइफाइड, टीबी और कैंसर जैसे रोगों में उपयोगी है। दालचीनी का तेल बनता है। दालचीनी,साबुन, दांतों के मंजन, पेस्ट, चाकलेट, सुगंध व उत्तेजक के रूप में काम में आती है।
-चाय, कॉफी में दालचीनी डालकर पीने से स्वादिष्ट हो जाती है। वजन कम करने वाले हर्ब में दालचीनी सबसे कारगर है। यह बॉडी के शुगर लेवल को कंट्रोल करती है। साथ ही, इसके सेवन से भूख लगना कम हो जाती है और फैट तेजी से मेटाबॉलाइज हो जाता है।
2) साधारण सा दिखने वाला अदरक ( GINGER) वाकई गुणों की खान है। आयुर्वेद में भी अदरक का खूब जिक्र है। अब तक आपने महज सर्दी-जुकाम में अदरक के कारगर होने की बात सुनी होगी, लेकिन नए वैज्ञानिक शोध के मुताबिक अदरक डायबिटीज की समस्या में भी कारगर साबित होता है। अदरक पेट साफ करने के लिए काफी अच्छा होता है। यह पाचन तंत्र में फंसे भोजन को हटाता है, जिससे फैट कम जमा होता है और वजन भी नहीं बढ़ता है।
3) इलाइची ( CARDAMOM )का लैटिन नाम इलेट्टेरिया कार्डियोमम है। इलाइची में टर्पिन, टर्पिनीनोल, सिनिओल, टर्पिनिल एसिटेट नमक रासायनिक तत्त्व पाए जाते हैं। यह शरीर के मेटाबॉलिज्म और फैट बर्न करने की क्षमता को बढ़ाता है।
4) हल्दी ( TURMERIC , CURCUMA LONGA )अपने औषधीय और सौंदर्यवर्धक गुणों के कारण रसोई की शान है। इसके पीले रंग के कारण भारतीय केसर के नाम से भी प्रसिद्ध हल्दी पौष्टिक गुणों से भरपूर होती है। हल्दी में वजन कम करने के गुण भी पाए जाते हैं। यह फैट टिशू के निर्माण को कम करता है। इससे शरीर में फैट कम बनता है, जिससे वजन बढ़ने की समस्या नहीं होती है।
5) एकाइ बेरी ( ACAI BERRY ..no hindi name ) शोध से पता चलता है कि एकाइ बेरी का जूस या सूखा पाउडर वजन कम करने में काफी असरदार होता है। यह शरीर में फैट बनने से रोकता है। इसमें कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट गुण भी पाए जाते हैं।
6) नेटल ( khokali / khokla / kuppu / khokli / bichu patta - Hindi Names ) की पत्तियां कई तरह के गुणों से भरपूर होती हैंं। इसमें विटामिन सी व विटामिन ए के अलावा एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं। इन पत्तियों के सेवन से खून साफ होने के साथ ही फैट भी बर्न होता है।
7) शोधों और आयुर्वेद के अनुसार, लाल मिर्च ( Cayenne pepper )में सक्सीनिक एसिड, शिकिमिक एसिड, आक्जेलिक एसिड, क्युनिक एसिड, अमीनो एसिड, एस्कार्बिक एसिड, फोलिक एसिड, सिट्रीक एसिड, मैलिक एसिड, मैलोनिक एसिड, आल्फा-एमिरिन, कैप्सीडीना, कैप्सी-कोसीन, कैरोटीन्स , क्रिप्तोकैप्सीन, बाई-फ्लेवोनाईड्स, कैप्सेंथीन, कैप्सोरूबीन डाईएस्टर, आदि तत्व उपस्थित होते हैं। लाल मिर्च में कैप्साइसिन नामक यौगिक भी पाया जाता है, जो मोटापा कम करने के साथ ही भूख के एहसास को भी कम करता है। एक शोध से यह बात सामने आई कि लाल मिर्च मेटाबॉलिज्म को बढ़ाती है, जिससे ज्यादा से ज्यादा कैलोरी बर्न होती है।
8) जीरा ( Cumin ) वैसे तो रसोई में काम आने वाला एक साधारण सा मसाला है, लेकिन यह औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है। अपच ,पेट फूलना ,भोजन में अरुचि में जीरे का सेवन लाभदायक होता है। बवासीर में जीरे को मिश्री के साथ खाने से कुछ आराम मिलता है। जीरा हमारे पाचन तंत्र को बेहतर बनाकर हमें ऊर्जावान रखता है। साथ ही, यह हमारे इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाता है। इसके नियमित रूप से सेवन से वजन नियंत्रण में रहता है।
9) गुआराना ( paullinia cupana - Guarana) में डाइयूरेटिक गुण पाया जाता है, जो वजन कम करने में मददगार होता है। साथ ही यह नर्वस सिस्टम को भी बेहतर बनाता है। इससे आप तनावमुक्त रहते हैं और खाने पर भी आपका नियंत्रण रहता है।
10) जिनसेंग ( GINSENG ) एनर्जी लेवल को बढ़ाता है। साथ ही, मेटाबॉलिज्म की गति को भी बेहतर बनाता है।
11) ग्वार गम ( cluster bean ) यानी ग्वार बीज डायबिटीज के रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद होता है और वजन कम करने में भी मददगार होता है। साथ ही, यह आपके पाचन तंत्र को भी बेहतर बनाता है।
12) सरसो ( Mustard ) मेटाबोलिक एक्टिविटी को तेज करता है, जिससे वजन कम करने में मदद मिलती है।
13) फ्लैक्स सीड { Flax seed , Hindi name - अलसी , तीसी - Alsi (Gujrati, Hindi Punjabi), Jawas (Marathi), Tishi (Bengali), Agasi (Kannada) } बल्किंग एजेंट का काम करता है और इसे खाने के बाद पेट भरा-भरा लगने लगता है। इससे आप ज्यादा खाने से बचेंगे, जिससे आपका वजन नहीं बढ़ेगा।
14) नारियल तेल ( Coconut oil ) भी मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है। इससे ऊर्जा बाहर निकलती है और वजन भी कम होता है।
15) सौंफ ( Fennel ) खाने से पाचन तंत्र में सुधार होता है और भूख भी नियंत्रित रहती है। इसके अलावा लीवर की सफाई भी होतीहै।
16) रोज रात को सोने से पहले ईसबगोल ( Isbgol) लेना वजन कम करने का एक सुरक्षित रास्ता है। इससे शरीर ऊर्जावान बना रहता है। साथ ही, शरीर की कार्र्बोहाइड्रेट सोखने की दर भी कम हो जाती है।
17) . काली मिर्च ( Black pepper ) आमतौर पर हर घर में इस्तेमाल होने वाली काली मिर्च में पाइपरीन नामक यौगिक पाया जाता है। यह यौगिक हमारे मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है। काली मिर्च हमारे पाचन तंत्र को बेहतर बनाने के साथ-साथ फैट बर्न की गति को भी बढ़ाती है।
18) कुकरौंधा ( Blumea lacera ) यह फूल हमारे पेट को साफ करने के साथ-साथ पाचन तंत्र को धीमा करता है। इसमें बड़ी मात्रा में पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं और यह आपको लंबे समय तक ऊर्जावान बनाए रखता है। आपके वजन कम करने में यह भी काफी कारगर साबित होगा।
19) गारसिनिया ( Garcinia Cambogia found in Kerala ) इस फल को खाने से भूख कम लगती है और शरीर में फैट का उत्पादन और जमाव भी कम होता है।
20) गुढ़ल ( China Rose, Chinese hibiscus ) के फूल में क्रोमियम, एसकॉर्बिक एसिड और हाइड्रॉक्सीसिटरिक एसिड सहित मोटापे से लड़ने वाले कई सारे एजेंट पाए जाते हैं।

महाभारत के युद्ध में कौरवों और पांडवों द्वारा रचित व्यूह रचनाएँ....

१. वज्र व्यूह .. महाभारत युद्ध के प्रथम दिन अर्जुन ने अपनी सेना को इस व्यूह के आकार में सजाया था... इसका आकार देखने में इन्द्रदेव के वज्र जैसा होता था अतः इस प्रकार के व्यूह को "वज्र व्यूह" कहते हैं!
२. चक्रशकट व्यूह ... अभिमन्यु की हत्या के पश्चात जब अर्जुन, जयद्रथ के प्राण लेने को उद्धत हुए, तब गुरु द्रोणाचार्य ने जयद्रथ की रक्षा के लिए युद्ध के चौदहवें दिन इस व्यूह की रचना की थी!
३. मंडल व्यूह ... भीष्म पितामह ने युद्ध के सांतवे दिन कौरव सेना को इसी मंडल व्यूह द्वारा सजाया था... इसका गठन परिपत्र रूप में होता था... ये बेहद कठिन व्यूहों में से एक था... पर फिर भी पांडवों ने इसे वज्र व्यूह द्वारा भेद दिया था... इसके प्रत्युत्तर में भीष्म ने "औरमी व्यूह" की रचना की थी... इसका तात्पर्य होता है समुद्र... ये समुद्र की लहरों के समान प्रतीत होता था... फिर इसके प्रत्युत्तर में अर्जुन ने "श्रीन्गातका व्यूह" की रचना की थी... ये व्यूह एक भवन के समान दिखता था...
४. क्रौंच व्यूह ... क्रौंच एक पक्षी होता है... जिसे आधुनिक भाषा में Demoiselle Crane कहते हैं... ये सारस की एक प्रजाति है...इस व्यूह का आकार इसी पक्षी की तरह होता है... युद्ध के दूसरे दिन युधिष्ठिर ने पांचाल पुत्र को इसी क्रौंच व्यूह से पांडव सेना सजाने का सुझाव दिया था... राजा द्रुपद इस पक्षी के सर की तरफ थे, तथा कुन्तीभोज इसकी आँखों के स्थान पर थे... आर्य सात्यकि की सेना इसकी गर्दन के स्थान पर थे... भीम तथा पांचाल पुत्र इसके पंखो (Wings) के स्थान पर थे... द्रोपदी के पांचो पुत्र तथा आर्य सात्यकि इसके पंखो की सुरक्षा में तैनात थे...इस तरह से हम देख सकते है की, ये व्यूह बहुत ताकतवर एवं असरदार था... पितामह भीष्म ने स्वयं इस व्यूह से अपनी कौरव सेना सजाई थी... भूरिश्रवा तथा शल्य इसके पंखो की सुरक्षा कर रहे थे... सोमदत्त, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा इस पक्षी के विभिन्न अंगों का दायित्व संभाल रहे थे...
५. प्रसिद्ध चक्रव्यूह ... इसके बारे में सभी ने सुना है... इसकी रचना गुरु द्रोणाचार्य ने युद्ध के तेरहवें दिन की थी... दुर्योधन इस चक्रव्यूह के बिलकुल मध्य (Centre) में था... बाकि सात महारथी इस व्यूह की विभिन्न परतों (layers) में थे... इस व्यूह के द्वार पर जयद्रथ था... सिर्फ अभिमन्यु ही इस व्यूह को भेदने में सफल हो पाया... पर वो अंतिम द्वार को पार नहीं कर सका... तथा बाद में ७ महारथियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी...इसके व्यूह के बारे में ज्यादा चर्चा की आवश्यकता नहीं है... इस व्यूह का संपूर्ण विवरण आपको हर कही मिल जाएगा...
६. अर्धचन्द्र व्यूह ... इसकी रचना अर्जुन ने कौरवों के गरुड़ व्यूह के प्रत्युत्तर में की थी... पांचाल पुत्र ने इस व्यूह को बनाने में अर्जुन की सहायता की थी ... इसके दाहिने तरफ भीम थे... इसकी उर्ध्व दिशा में द्रुपद तथा विराट नरेश की सेनाएं थी... उनके ठीक आगे पांचाल पुत्र, नील, धृष्टकेतु, और शिखंडी थे... युधिष्ठिर इसके मध्य में थे... सात्यकि, द्रौपदी के पांच पुत्र, अभिमन्यु, घटोत्कच, कोकय बंधु इस व्यूह के बायीं ओर थे... तथा इसके अग्र भाग पर अर्जुन स्वयं सच्चिदानंद स्वरुप भगवन श्रीकृष्ण के साथ थे!