Wednesday, March 25, 2015

!! फिर गयी दुहाई प्रताप की अहमदाबाद में !!

!! फिर गयी दुहाई प्रताप की अहमदाबाद में !!
!! अपने जन्म दिन पर बलिदानी वीरों, क्रांतिकारियों को समर्पित यह उत्साहप्रद ऐतिहासिक कथा !!
प्रताप को अपना संघर्ष चलाते रहने के लिए धन की तीव्र आवश्यकता थी !
मेवाड़ में तो सुरक्षा दृष्टि से खेती को ही प्रतिबन्धित का दिया गया था !
न जनता मैदानों में रहेगी, न खेती करेगी तो आक्रमणकारियों को भी खाने को नहीं मिलेगा !
इसी नीति की परिपालना के कारण ही अकबर की मानसिंह नीत सेना गोगुन्दा में भूखी मर गयी थी और छोड़ भागी थी अपनी जान बचाने को !
मेवाड़ की जनता और कुछ कमाई का धन्धा भी नहीं कर पाती थी !
लगातार स्थान स्थान पर शत्रु से लड़ते भिड़ते रहना पड़ता था !
इस के अतिरिक्त -
चारों ओर पहरा देना,
दूर दूर के समाचार लाना और ले जाना
और
प्रताप और अन्य सेनाधिकारियों व सैनिकों के परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने का कार्य भी इनको करते रहना पड़ता था !
एक प्रकार से अघोषित आपातकाल लगा हुआ था पूरे मेवाड़ में !
पूरा राज्य ही सैनिक बना हुआ था !
तब वेतन देने के लिए तो कोई धन की आवश्यकता नहीं थी !
किन्तु शस्त्रास्त्र के लिए तो धन चाहिए ही था !
मेवाड़ में तो धन था नहीं !
और न जनता को अवकाश था धन कमाने के लिए !
अतः धन की तीव्र आवश्यकता थी !
प्रताप ने इसकी भी व्यवस्था की हुई थी !
इसी की एक कहानी है यह -
'' फिर गयी दुहाई प्रताप की ''
अहमदाबाद पर अकबर ने कब्जा कर लिया था !
समुद्री मार्ग से होने वाले व्यापार पर अकबर ने अपना पंजा कस रखा था !
वहीं पर धावा बोला प्रताप की सेना ने !
अकबर की सेना मेवाड़ में लूटपाट करती थी तो प्रताप ने भी अकबर को दुर्बल करने और दुर्बल सिद्ध करने की लिए अकबर अधिकृत क्षेत्रों में प्रत्याक्रमण और लूटपाट की यशस्वी योजना लागू की !
एक दिन अहमदाबाद की जनता निश्चिन्त सोई हुई थी !
सूर्य नारायण ने आकाश में पदार्पण किया ही था !
आकाश देवता भगवा रंग से विभूषित हो रहे थे
और मूर्ख मुग़ल सैनिक छावनी का हरा झण्डा लहराने में लगे हुए थे
कि अकस्मात्
'' एकलिंगनाथ की जय ''
का आकाश-नादित घोर नाद सुनाई दिया !
झण्डा लहराने लगे सैनिक टुकड़ी के कुछ सैनिक हल्दी घाटी युद्ध में रहे थे
और
'' एकलिंगनाथ की जय ''
इस महा वाक्य का चमत्कार देख चुके थे !
मोलेला ग्राम की छावनी से बनास नदी को पार कर अकबर की विशाल अजगरी सेना अहंकार मद में चूर हुई धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी !
ख्वाजा साहब से लेकर मोलेला तक कोई भी प्रतिरोध नही हुआ था !
अकबर के सेनानायकों ने अपने सैनिकों में प्रवाद फैला रखा था कि प्रताप तो पहाड़ी चूहा है ! पहाड़ के किसी बिल में घुसा हुआ है ! बस उसे ढूंढ कर एक पिंजरे में बंद करेंगे और जहाँपनाह के दरबार में पेश करेंगे !
बड़े अहंकार में थी अकबर की सेना !
चली जा रही थी मदमाती हुई !
आ गयी बड़ी सकड़ी घाटी !
एक ही एक बार में घुस सके इतनी सकड़ी !
वहीं पर पहली बार सुना था इन मुगलों ने
'' एकलिंगनाथ की जय ''
का उद्घोष !
जिसे वे चूहा समझ रहे थे, वह चूहा नही था, वह तो सिंह निकला !
सबसे पहले अपने धवल श्वेत रंग के घोड़े पर
'' एकलिंगनाथ की जय ''
बोलता हुआ वही निकला था उस सकड़ी घाटी में से !
बस फिर तो चमत्कार हो गया,
न जाने चारों और के पहाड़ों में से कितने ही
'' एकलिंगनाथ की जय ''
बोलने वाले निकल आये और टूट पड़े मुग़ल सेना पर !
जाने कोई भूत ही जाग गए हों पहाड़ों में !
भागना पड़ गया मुग़ल सेना को !
जिधर जो जहां भागे उधर वहां भी
'' एकलिंगनाथ की जय ''
बोलने वाले और तीर, भाले, भाटे बरसाने वाले प्रकट होते रहे !
कोई छह कोस भागे तब जान बची !
आज वे झण्डा चढ़ा रहे थे कि
'' एकलिंगनाथ की जय ''
का बहुतों के द्वरा उच्चारित उच्चस्वर सुनाई दिया !
वे झण्डा चढ़ाना भूल गए !
भाग जाने और जान बचाने में ही उन्होंने अपनी भलाई समझी !
प्रताप के सैनिक भी न जाने किस माटी के बने हुए थे,
न जाने क्या पाटी पढ़े हुए थे कि आक्रमण भी छावनी में वहां किया जहां झण्डा चढ़ाया जा रहा था !
अकबर के फौजी झण्डा अधबिच में छोड़ भागे,
चिल्लाते भी गए -
'' भागो, भागो प्रताप आ गया है ! ''
प्रताप के सैनिक तो सचमुच में चमत्कारी थे !
वे एक स्थान पर नहीं तो छावनी में कई स्थानों पर प्रकट हुए !
बीसियों स्थानों पर
'' एकलिंगनाथ की जय ''
का घोर उद्घोष हुआ और उन सभी स्थानों पर वही हुआ जो ध्वज-स्थान वालों का हुआ था !
सभी ओर
'' भागो, भागो प्रताप आ गया है ''
गूंजने लगा !
कोई बेवकूफ प्रतापी सेना के सामने आया तो वह मेवाड़ी तलवार का कलेवा बन गया !
सारी छावनी उद्ध्वस्त हो गयी !
'' प्रताप आ गया है '' और '' भूत आ गया है '' में अन्तर ही किसी को समझ में नहीं आया !
प्रताप की सेना अकबर का खजाना एकत्र करने लगी !
प्रताप की सेना अपने काम में लगी ही थी कि अहमदाबाद के दो तीन बड़े सेठ वहां पर आ नत-मस्तक हुए !
'' खमा घणी सेठ भामाशाह जी, जय एकलिंग, जय जिनेन्द्र !''
उन सेठों ने कहा !
वास्तव में प्रताप वहां नहीं थे !
प्रताप की सेना भामाशाह के नेतृत्व में अहमदाबाद अभियान पर गयी थी !
विभिन्न स्थानों पर विभिन्न सेनानायकों के नेतृत्व में प्रतापी सेना अकबरी क्षेत्र में अभियान करती रहती थी !
इससे अनेक लाभ होते थे !
अकबर की सेना का मनोबल टूटता था और अकबर अधिकृत हिन्दू जनता में आशा और विश्वास का संचार होता था !
अहमदाबाद में प्रताप की सेना का यह आक्रमण अप्रत्याशित था !
पूर्णतः सुरक्षित छावनी के बुझदिल अकबरी फौजी अनेक वर्षों से कभी लड़े ही नहीं थे !
इतनी दूर प्रताप की सेना आ जायेगी, यह तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था !
खा खा कर मोटे हुए उन फौजियों से न तो भागा गया और न लड़ा गया !
जो कोई दोजख नसीन हुए, उनको छोड़ कर
और जो भाग खड़े होने में सफल हुए, उनको छोड़ कर बहुतेरे शण्ड-मुसण्ड मरियल अकबरी फौजी गिरफ्त में आ गये !
इन फौजियों ने फहले अनेक हिन्दुओं को गिरफ्तार किया हुआ था
उन सब लाचार हिन्दुओं से बेगार कराई जाती थी !
अब उलटा हो गया !
गिरफ्तार मुग़ल फौजी ही छावनी के गुप्त स्थानों से धन और हिन्दू जनता से लूट लूट कर भरा हुआ सोने चांदी के आभूषणों के भण्डारों को ढूंढ ढूंढ कर लाने की बेगार कर रहे थे, अपनी जान बचाने के लिए !
हिन्दू बेगारी तो अब स्वतंत्र हो गए !
भामाशाह ने उनको कहा कि फौजियों का खाना खाओ
और अपने अपने गाँव जाओ,
और सब को बताते जाना कि -
महाराणा प्रताप की मुक्ति सेना ने तुम सब को मुक्त कर दिया है !
भामाशाह ने उनको यह भी कहा कि तुम लोगों ने जितने दिन यहां बेगार की,
उतने दिन का वेतन इस धन के ढेर में से अपने आप उठा ले जाओ
जितना चाहो उतना ले जाओ !
किन्तु वे नव स्वतन्त्र हुए हिन्दू नागरिक मोह-माया और लालच से तो पहले ही स्वतन्त्र थे !
वे भामाशाह के चरणों में गिर पड़े
और बोले -
हे हिन्दू राष्ट्र के सजग प्रहरी !
हमारी देहों पर तो अकबर के फौजियों का कब्जा था,
किन्तु हमारी आत्मा पर उनका अधिकार न कभी हुआ है और न भविष्य में हो सकता है !
हिन्दू राष्ट्र के लिए काम आने वाले धन को हम न छुएंगे !
एक बार हम घर वालों को मिल कर आजायें,
फिर हम भी महाराणा की सेवा में उपस्थित होंगे
और हम भी मातृभूमि की निशुल्क, निःस्वार्थ सेवा में लगेंगे !
भगवान एकलिंगनाथ जी और
महाराणा प्रताप की जय जय कार करते हुए वे मुक्त हुए बन्धक
अहमदाबाद की विभिन्न गलियों बाजारों में से अपने गाँवों की ओर निकले !
इन से ही नगरवासियों को पता चला कि प्रताप की प्रतापी मुक्ति सेना ने मुग़ल छावनी को समूल नष्ट कर दिया है
अर्थात्
अहमदाबाद को मुक्त करा दिया है !
इस समाचार से अवगत हो कर ही वे दो तीन बड़े सेठ जो भामाशाह से पूर्व से परिचित थे और जिनसे हिन्दू राष्ट्र का गुप्त सम्पर्क चलता रहता था,
वे दौड़ कर छावनी आये और भामाशाह से सम्पर्क किया !
उनके पहुंचते पहुंचते और भी अन्य नागरिक व सेठ-गण आ उपस्थित होने लगे !
छावनी का आकाश जय जय कारों से गूँज गया !
कुछ उत्साही युवकों ने धरती पर गिर पड़ा हुआ शाही हरा झण्डा पैरों से कुचल दिया और अपने साथ लाया हुआ भगवा झण्डा बड़े प्यार और अधिकार के साथ लहरा दिया !
जो भी वहां आया वह खाली हाथ नहीं आया !
कोई मुक्ति सैनिकों के लिए भोजन लाया,
कोई छाछ-राबड़ी लाया,
कोई फल-फूल लाया,
कोई गुलाल लाया,
कोई फटाके धमाके लाया,
कोई धन आभूषण लेकर आया,
सब चाह रहे थे कि मुक्ति सेना मेवाड़ के लिए लौटे तो उनके मोहल्ले में हो कर निकले !
भामाशाह ने भी सब की लाज रखी !
पूरे अहमदाबाद में ही घूम गयी विजयी प्रतापी सेना जयकारों और रंग-गुलाल के बीच
अपने एकलिंगनाथ जी महाराज के विश्व-विजयी झण्डे के साथ !
थोड़े ही समय में पूरा नगर भगवा पताकाओं और जयकारों से पट गया था !
दुहाई फिर गयी चारों ओर महाराणा प्रताप की !
सब को लग रहा था कि
अब हमारा नगर अहमदाबाद नही है,
फिर से
पवित्र '' कर्णावती '' नगर हो गया है !
इतिहास बताता है कि भामाशाह ने इस विजयी अभियान के फल स्वरूप अहमदाबाद से दो करोड़ रुपयों का धन लाकर महाराणा प्रताप को समर्पित किया !
आज उसका मूल्य आंकना भी कठिन है !
और इसका परिणाम यह भी हुआ कि अहमदाबाद की ओर से कभी भी कोई मुग़ल अभियान मेवाड़ तो क्या राजस्थान के किसी भी क्षेत्र की ओर नहीं हुआ !
'' एकलिंग नाथ महाराज की जय ''
'' कालिका माता की जय ''
'' भारत माता की जय ''

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