तस्करी के जाल में कैद होती बेटियां....
"जब मैं 13 साल की थी मैं काठमांडू के होटल में काम करने आई, लेकिन मुझे सीधे मसाज पार्लर ले जाया गया." देह व्यापार के चक्रव्यूह में फंसी सीता तमांग कहती हैं कि शुरुआत में तो उसकी देखभाल की गई, लेकिन एक हफ्ते बाद पार्लर के मालिकों ने उसे बताया कि ग्राहक उससे क्या उम्मीद रखते हैं. "मैं बहुत रोई और मुझे डर लग रहा था. फिर बाकी लड़कियों ने कहा कि उनके साथ भी ऐसा ही हुआ है और इसमें कोई खतरा नहीं है." 18 साल की तमांग लेकिन कभी वापस घर नहीं गई. जब वह छोटी लड़कियों को देखती है तो उसे अपना बचपन याद आता है....
"जब मैं 13 साल की थी मैं काठमांडू के होटल में काम करने आई, लेकिन मुझे सीधे मसाज पार्लर ले जाया गया." देह व्यापार के चक्रव्यूह में फंसी सीता तमांग कहती हैं कि शुरुआत में तो उसकी देखभाल की गई, लेकिन एक हफ्ते बाद पार्लर के मालिकों ने उसे बताया कि ग्राहक उससे क्या उम्मीद रखते हैं. "मैं बहुत रोई और मुझे डर लग रहा था. फिर बाकी लड़कियों ने कहा कि उनके साथ भी ऐसा ही हुआ है और इसमें कोई खतरा नहीं है." 18 साल की तमांग लेकिन कभी वापस घर नहीं गई. जब वह छोटी लड़कियों को देखती है तो उसे अपना बचपन याद आता है....
सुंदरबन
(पश्चिम बंगाल)। रिंकी महज़ सोलह साल की है पर अपनी उम्र से बहुत ज़्यादा
समझदार है। रिंकी उन आठ लड़कियों में से है जिन्हें दो साल तक घर से दूर
गुमनामी का जीवन जीने के बाद बचाया गया। रिंकी गाँव से बाहर शहर के एक घर
में काम करने गई थी, माता-पिता से संपर्क टूटने के बाद से रिंकी लापता
थी....
कुछ समय पहले पहाडग़ंज की उन्हीं गंदी गलियों से पुलिस ने निर्मला नाम की एक और लड़की को भी बचाया था। उसे लड़कियों के एक तस्कर को बेच दिया गया था। बेचने वाला भी और कोई नहीं बल्कि उसी के परिवार का सदस्य था जो उसे अच्छी नौकरी का दिलासा देकर शहर लाया था....
यह कहानियां कुछ ऐसी लड़कियों की हैं जो अलग-थलग, कैद और उपेक्षा का जीवन जीने के बाद भी वापस अपने घर आने में सफल हुईं। हमारे देश भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और पिछड़े इलाको से और पडोसी देश नेपाल , बांग्लादेश मैं से लाखो गरीब लड़कियों को नौकरी का सब्जबाग दिखाकर मानव तस्कर देह की मंडियों में ले जाते हैं । जिनको कोठो पर बेच दिया जाता हैं और कुछ लड़कियों को ये तस्कर वीजा दिलाकर अरब के शेखों के हवाले कर देते हैं। बहुत छोटी उम्र में ही ये लड़कियां देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं. ऐसा नही हैं की यह यह सारी लडकिया तस्करो के द्वारा ही देह व्यापर में लायी जाती हो कई गरीब, गांव के लोग अपनी लड़कियों को को बेच देते हैं. और कुछ मामलों में शादी का लालच देकर बिचौलिये इन्हें चकलाघरों में बेच देते हैं. कम उम्र की बच्चियों में स्टेरॉयड काम नहीं करते, खासकर 12 से 14 की उम्र वाली लड़कियों में. तो लड़कियों को भरा पूरा दिखाने के लिए ओराडेक्सॉन नाम का स्टेरॉयड इस्तेमाल किया जाता है. सामान्य तौर पर ये स्टेरॉयड किसान अपनी गायों को हृष्ट पुष्ट बनाने के लिए करते हैं.यह सच है कि इस कारोबार के प्रति झुकाव के लिए देश की गरीबी और बेरोजगारी के साथ ही सरकारों की गरीब विरोधी नीतियां अधिक जिम्मेदार है, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हकीकत यह है कि कोई भी महिला खुशी-खुशी अपनी इच्छा से इस काम को नहीं अपनाती। बहुआयामी अनवरत शोषण और रोजगार की विकल्पहीनता ही उन्हें मजबूरन इस कर्म की ओर खींचकर ले आती हैं।
"बचपन बचाओ आंदोलन\" की ओर से हाल ही जारी किए गए आंकड़े हमें शर्मसार कर देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 1 साल से कुछ अधिक समय मैं एक लाख 70 हजार से अधिक बच्चे लापता हुए हैं। इनमें से अधिकतर बच्चों का देह व्यापार और बाल मजदूरी के लिए अपहरण किया गया है। बच्चियों को देह व्यापार में झोंक दिया जाता है और लड़कों से या तो जबरन मजदूरी कराई जाती है या फिर उनके अंग निकाल कर उन्हें बेच दिया जाता है।
90,000 बच्चे खो जाते हैं हर साल भारत में, इनमें से 30,000 की ही हो पाती है तलाश।
11 बच्चे हर घंटे में गुम हो जाते हैं देश में।
40 लाख बच्चे हैं सिर्फ घरेलू सेवाओ में।
33 अरब डॉलर का है बच्चों की तस्करी का व्यापार
कुछ समय पहले पहाडग़ंज की उन्हीं गंदी गलियों से पुलिस ने निर्मला नाम की एक और लड़की को भी बचाया था। उसे लड़कियों के एक तस्कर को बेच दिया गया था। बेचने वाला भी और कोई नहीं बल्कि उसी के परिवार का सदस्य था जो उसे अच्छी नौकरी का दिलासा देकर शहर लाया था....
यह कहानियां कुछ ऐसी लड़कियों की हैं जो अलग-थलग, कैद और उपेक्षा का जीवन जीने के बाद भी वापस अपने घर आने में सफल हुईं। हमारे देश भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और पिछड़े इलाको से और पडोसी देश नेपाल , बांग्लादेश मैं से लाखो गरीब लड़कियों को नौकरी का सब्जबाग दिखाकर मानव तस्कर देह की मंडियों में ले जाते हैं । जिनको कोठो पर बेच दिया जाता हैं और कुछ लड़कियों को ये तस्कर वीजा दिलाकर अरब के शेखों के हवाले कर देते हैं। बहुत छोटी उम्र में ही ये लड़कियां देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं. ऐसा नही हैं की यह यह सारी लडकिया तस्करो के द्वारा ही देह व्यापर में लायी जाती हो कई गरीब, गांव के लोग अपनी लड़कियों को को बेच देते हैं. और कुछ मामलों में शादी का लालच देकर बिचौलिये इन्हें चकलाघरों में बेच देते हैं. कम उम्र की बच्चियों में स्टेरॉयड काम नहीं करते, खासकर 12 से 14 की उम्र वाली लड़कियों में. तो लड़कियों को भरा पूरा दिखाने के लिए ओराडेक्सॉन नाम का स्टेरॉयड इस्तेमाल किया जाता है. सामान्य तौर पर ये स्टेरॉयड किसान अपनी गायों को हृष्ट पुष्ट बनाने के लिए करते हैं.यह सच है कि इस कारोबार के प्रति झुकाव के लिए देश की गरीबी और बेरोजगारी के साथ ही सरकारों की गरीब विरोधी नीतियां अधिक जिम्मेदार है, कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हकीकत यह है कि कोई भी महिला खुशी-खुशी अपनी इच्छा से इस काम को नहीं अपनाती। बहुआयामी अनवरत शोषण और रोजगार की विकल्पहीनता ही उन्हें मजबूरन इस कर्म की ओर खींचकर ले आती हैं।
"बचपन बचाओ आंदोलन\" की ओर से हाल ही जारी किए गए आंकड़े हमें शर्मसार कर देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 1 साल से कुछ अधिक समय मैं एक लाख 70 हजार से अधिक बच्चे लापता हुए हैं। इनमें से अधिकतर बच्चों का देह व्यापार और बाल मजदूरी के लिए अपहरण किया गया है। बच्चियों को देह व्यापार में झोंक दिया जाता है और लड़कों से या तो जबरन मजदूरी कराई जाती है या फिर उनके अंग निकाल कर उन्हें बेच दिया जाता है।
90,000 बच्चे खो जाते हैं हर साल भारत में, इनमें से 30,000 की ही हो पाती है तलाश।
11 बच्चे हर घंटे में गुम हो जाते हैं देश में।
40 लाख बच्चे हैं सिर्फ घरेलू सेवाओ में।
33 अरब डॉलर का है बच्चों की तस्करी का व्यापार

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