Saturday, February 13, 2016

धरती पर भगवान हैं सिद्ध करके दिखाता हूँ


आइये आज आपको "धरती पर भगवान हैं
सिद्ध करके दिखाता हूँ" :

१. "अमरनाथजी" में शिवलिंग अपने आप
बनता है

२. "माँ ज्वालामुखी" में
हमेशा ज्वाला निकलती है

३. "मैहर माता मंदिर" में रात को आल्हा अब
भी आते हैं

४. सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर में 3000
बम में से एक
का ना फूटना

५. इतने बड़े हादसे के बाद भी "केदारनाथ
मंदिर" का बाल ना बांका होना

६. पूरी दुनियां मैं आज भी सिर्फ "रामसेतु के
पत्थर" पानी में तैरते हैं

७. "रामेश्वरम धाम" में सागर का कभी उफान
न मारना

८. "पुरी के मंदिर" के ऊपर से
किसी पक्षी या विमान का न निकलना

९. "पुरी मंदिर" की पताका हमेशा हवा के
विपरीत दिशा में उड़ना

१०. उज्जैन में "भैरोंनाथ" का मदिरा पीना

११. गंगा और नर्मदा माँ (नदी) के
पानी का कभी खराब न होना

१२,श्री राम नाम धन संग्रह बॆंक में संग्रहीत इकतालीस अरब राम नाम मंत्र पूरित ग्रंथों को (कागज होने पर भी) चूहों द्वारा नहीं काटा जान। जबकि अनेक चूहे अंदर घुमते रहते हॆं।

Sunday, May 24, 2015

महर्षि अगस्त्य

निश्चित ही बिजली का आविष्कार बेंजामिन फ्रेंक्लिन ने किया लेकिन बेंजामिन फ्रेंक्लिन अपनी एक किताब में लिखते हैं कि एक रात मैं संस्कृत का एक वाक्य पढ़ते-पढ़ते सो गया। उस रात मुझे स्वप्न में संस्कृत के उस वचन का अर्थ और रहस्य समझ में आया जिससे मुझे मदद मिली।
महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ऋषि थे। महर्षि अगस्त्य राजा दशरथ के राजगुरु थे। इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती है। ऋषि अगस्त्य ने 'अगस्त्य संहिता' नामक ग्रंथ की रचना की। आश्चर्यजनक रूप से इस ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्र मिलते हैं-
संस्थाप्य मृण्मये पात्रे
ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌।
छादयेच्छिखिग्रीवेन
चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥
-अगस्त्य संहिता
अर्थात : एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएं, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Electricity) का उदय होगा।
अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबे या सोने या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं।

Friday, May 22, 2015

एक बार इस कविता को दिल से पढ़िये शब्द शब्द में गहराई है..

जब आंख खुली तो अम्मा की
गोदी का एक सहारा था
उसका नन्हा सा आंचल मुझको
भूमण्डल से प्यारा था
उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था
उसके स्तन की एक बूंद से
मुझको जीवन मिलता था
हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस मां ने पुचकारा
हमको जी भर के प्यार किया
मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी
मैं बनूं बुढापे में उसका
बस एक सहारा कहती थी
उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज
अन्तर में सदा सहेजा था
मेरे सारे प्रश्नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी
मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी
मैं बडा हुआ तो कॉलेज से
इक रोग प्यार का ले आया
जिस दिल में मां की मूरत थी
वो रामकली को दे आया
शादी की पति से बाप बना
अपने रिश्तों में झूल गया
अब करवाचौथ मनाता हूं
मां की ममता को भूल गया
हम भूल गये उसकी ममता
मेरे जीवन की थाती थी
हम भूल गये अपना जीवन
वो अमृत वाली छाती थी
हम भूल गये वो खुद भूखी
रह करके हमें खिलाती थी
हमको सूखा बिस्तर देकर
खुद गीले में सो जाती थी
हम भूल गये उसने ही
होठों को भाषा सिखलायी थी
मेरी नीदों के लिए रात भर
उसने लोरी गायी थी
हम भूल गये हर गलती पर
उसने डांटा समझाया था
बच जाउं बुरी नजर से
काला टीका सदा लगाया था
हम बडे हुए तो ममता वाले
सारे बन्धन तोड. आए
बंगले में कुत्ते पाल लिए
मां को वृद्धाश्रम छोड आए
उसके सपनों का महल गिरा कर
कंकर-कंकर बीन लिए
खुदग़र्जी में उसके सुहाग के
आभूषण तक छीन लिए
हम मां को घर के बंटवारे की
अभिलाषा तक ले आए
उसको पावन मंदिर से
गाली की भाषा तक ले आए
मां की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है
गर मां अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है
घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी मां क्या पाती है
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है
जो मां जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं
वो लाखों पुण्य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं
मां जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है
मां के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है
मां के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है
मां के चरणों में जन्नत है
गिरिजाघर और शिवाला है
हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है
दुनियां में जितनी खुशबू है
मां के आंचल से आई है
मां कबिरा की साखी जैसी
मां तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है
मां आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है
मां वेद ऋचाओं की गरिमा
मां महाकाव्य की काया है
मां मानसरोवर ममता का
मां गोमुख की उंचाई है
मां परिवारों का संगम है
मां रिश्तों की गहराई है
मां हरी दूब है धरती की
मां केसर वाली क्यारी है
मां की उपमा केवल मां है
मां हर घर की फुलवारी है
सातों सुर नर्तन करते जब
कोई मां लोरी गाती है
मां जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है
मां हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है
माना मेरे घर की दीवारों में
चन्दा सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल मां की मूरत है
मां सरस्वती लक्ष्मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है
मां पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है
अम्मा तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है
हे मां तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है
सारे तीरथ के पुण्य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं
जिनके कोई सन्तान नहीं
मैं उन मांओं का बेटा हूं
हर घर में मां की पूजा हो
ऐसा संकल्प उठाता हूं
मैं दुनियां की हर मां के
चरणों में ये शीश झुकाता हूं...

Thursday, May 21, 2015

जनेऊ पहनने के लाभ

जनेऊ पहनने के लाभ
पूर्व में बालक की उम्र आठ वर्ष होते ही उसका यज्ञोपवित संस्कार कर दिया जाता था। वर्तमान में यह प्रथा लोप सी हो गई है। जनेऊ पहनने का हमारे स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। पूर्व काल में जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को पढऩे का अधिकार मिलता था। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा मल-मूत्र विसर्जन के समय कान के पास ही एक नस से कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देता है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपना जनेऊ कान पर से तब तक नहीं उतार सकता जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है।

Thursday, May 14, 2015

बोधिधर्मन

बोधिधर्मन
कई बार हमें शाओलिन मॉन्क से जुड़ी ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं जिनके बारे में जानकर हैरत होती है। कोई शाओलिन मॉन्क पानी पर दौड़ लगाता है तो कोई कड़ाही में खौलते पानी में बैठ जाता है, इसके बावजूद उसे कुछ नहीं होता है। दरअसल, ये एक आर्ट है जिस वजह से शाओलिन भिक्षु ऐसा कर गुजरते हैं।
क्या आप जानते हैं कि ये कला चीन और जापान जैसे देशों में कहां से आई? बता दें कि एक भारतीय शख्स ने इस कला को दुनिया के कई देशों में फैलाया था। इस शख्स का नाम बोधिधर्मन था। ऐतिहासिक तथ्यों की मानें तो इन्होंने ही चीन-जापान के लोगों को मार्शल आर्ट सिखाई थी, जिस पर आज वे पूरी दुनिया में इतराते हैं।
कौन थे बोधिधर्मन
आखिर ये बोधिधर्मन कौन थे? बता दें कि बोधिधर्मन मार्शल आर्ट और आयुर्वेद चिकित्सा के जानकार थे। इनका जन्म दक्षिण भारत में पल्लव राज परिवार में हुआ था। वह कांचीपुरम के राजा के पुत्र थे, लेकिन छोटी आयु में ही उन्होंने राज्य छोड़ दिया और भिक्षुक बन गए। इसी क्रम में वे चीन पहुंचे, जहां उन्होंने लोगों की रक्षा की और उन्हें महामारी से भी बचाया। चीन के लोगों ने मार्शल आर्ट और आयुर्वेद चिकित्सा सीखने की इच्छा जाहिर की, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
भारत में अमूमन ज्यादातर लोगों को बोधिधर्मन के बारे में कोई भी जानकारी नहीं है। लेकिन चीन में अधिकतर लोगों को बोधिधर्मन के बारे में पता है। वहां पर इन्हें धामू के नाम से भी जाना जाता है। इतना ही नहीं, शाओलिन टेंपल में इनकी मूर्तियां स्थापित हैं और लोग इन्हें पूजते हैं।
बन चुकी है फिल्म
दक्षिण भारतीय भाषा में बोधिधर्मन के पर फिल्म भी बन चुकी है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि अपनी मां की इच्छा के अनुसार बोधिधर्मन चीन पहुंचते हैं। वहां पर लोगों को आत्मरक्षा और चिकित्सा की जानकारी देते हैं। हालांकि, अंत में जब वे अपने देश लौटने की इच्छा जाहिर करते हैं, तो वहां के विद्वान यह आशंका व्यक्त करते हैं कि उनके जाने से महामारी फिर से आ सकती है। इसके बाद वहां के लोगों ने उन्हें खाने में जहर दे दिया। हालांकि, बोधिधर्मन को इसका पता चल गया था, इसके बावजूद उन्होंने जहरीला भोजन ग्रहण कर लिया। इस फिल्म में सुपरस्टार सूर्या ने बोधिधर्मन की भूमिका निभाई थी।
चाय के अन्वेषक हैं बोधिधर्मन
ऐसा कहा जाता है कि बोधिधर्मन चाय के अन्वेषक हैं। इसको लेकर दंत कथाएं भी प्रचलित हैं। एक दंत कथा के मुताबिक, एक बार बोधिधर्मन ध्यान करते-करते सो गए। इस बात से उन्हें अपने ऊपर इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी पलकों को ही काट डाला। जब उनकी कटी पलकें जमीन पर गिरी, तो वे चाय का पौधा बन गईं। तब से नींद से बचने के लिए भिक्षुओं को चाय पहुंचाई जाने लगी।
कलारिपयात्तु की देन है मार्शल आर्ट
वर्तमान के मार्शल आर्ट चाहे वो कुंग फू हो या वुशु या फिर ताइक्वांडो और कराटे, ये सब प्राचीन भारतीय आत्मरक्षा शैली कलारिपयात्तु की देन हैं। आज भी दक्षिण भारत में लोग इस कला को सीखते हैं। बॉलीवुड एक्टर विद्युत जामवाल भी इस कला में एक्सपर्ट हैं।

Saturday, May 9, 2015

एक हरियाणवी कविता होली सुसराड़ की

एक हरियाणवी कविता होली सुसराड़ की

मैं गया सुसराड़
नया कुर्ता गाड़

दाढ़ी बनवाई बाल रंग्वाए
रेहड़ी पर ते संतरे तुलवाए

हाथ मैं दो किलो फ्रूट
मैं हो रया सुटम सूट

फागन का महिना था
आ रया पसीना था

पोहंच गया गाम मैं
मीठे मीठे घाम मैं

सुसराड़ का टोरा था
मैं अकड में होरा था

साले मिलगे घर के बाहर
बोले आ रिश्तेदार आ रिश्तेदार

बस मेरी खातिरदारी शुरू होगी
रात ने खा पीके सोगया तडके मेरी बारी शुरू होगी

सोटे ले ले शाहले आगी
मेरे ते मिठाईया के पैसे मांगन लागी

दो दो चार चार सबने लगाये
पैसे भी दिए और सोटे भी खाए

साली भी मेरी मुह ने फेर गी
गाढ़ा रंग घोल के सर पे गेर गी

सारा टोरा होगया था ढिल्ला ढिल्ला
गात होगया लिल्ला लिल्ला गिल्ला गिल्ला

रहा सहा टोरा साला ने मिटा दिया
भर के कोली नाली में लिटा दिया

साँझ ताहि देहि काली आँख लाल होगी
बन्दर बरगी मेरी चाल होगी

बटेऊ हाडे तो नु हे सोटे खावेगा
बता फेर होली पे हाडे आवेगा

मैं हाथ जोड़ बोल्या या गलती फेर
नहीं दोहराऊंगा

होली तो के मैं थारे दिवाली ने
भी नहीं आउंगा.............