सड़क हूँ
सालों-साल अपाहिज सी
फाइलों के ढेर में
दबी पड़ी थी
एक दिन खुली
और चल पड़ी
एक टेबल से दूसरी टेबल,
दूसरी से तीसरी
हरी नोट-शीट पर नीली स्याही
के नीचे कागज़ पर कागज़
सजने लगे
वजन भारी हुआ
पर मन हल्का हुआ कि
चलो कुछ बात तो बनी
दस्तखतों और प्रश्वाचक चिन्हों के
अवरोधकों को पार किया
और निर्माण कार्य शुरू
रोड़ी, सीमेंट, गारा, कोलतार
कागजों में पड़ता रहा
मेरी प्रोग्रेस रिपोर्ट
बनती रही
चपरासी, बाबू, ठेकेदार,
इंजीनयर, अफसर ...
सभी अपने-अपने हिस्से
की कालिख लेकर आये
और मुझे सजाने लगे
वे लोग मुझे कुतरते, खाते,
चबाते और
धकेलते हुए
कई किलोमीटर तक ले आये
और फिर
एक दिन........
सरकार बदल गई
पर कुर्सियां नहीं बदली
एक नया आदेश पारित हुआ
सड़क का निर्माण
अवैध है
इसे तोड़ा जाए
शुरू से आखिर तक
और फिर
वही लोग
कागजों पर
पिल पड़े
हथोडे, कुदालें और सरिये ले कर
अब मैं टूट चुकी हूँ
कैसे कहूँ कि
मैं एक सड़क हूँ
सालों-साल अपाहिज सी
फाइलों के ढेर में
दबी पड़ी थी
एक दिन खुली
और चल पड़ी
एक टेबल से दूसरी टेबल,
दूसरी से तीसरी
हरी नोट-शीट पर नीली स्याही
के नीचे कागज़ पर कागज़
सजने लगे
वजन भारी हुआ
पर मन हल्का हुआ कि
चलो कुछ बात तो बनी
दस्तखतों और प्रश्वाचक चिन्हों के
अवरोधकों को पार किया
और निर्माण कार्य शुरू
रोड़ी, सीमेंट, गारा, कोलतार
कागजों में पड़ता रहा
मेरी प्रोग्रेस रिपोर्ट
बनती रही
चपरासी, बाबू, ठेकेदार,
इंजीनयर, अफसर ...
सभी अपने-अपने हिस्से
की कालिख लेकर आये
और मुझे सजाने लगे
वे लोग मुझे कुतरते, खाते,
चबाते और
धकेलते हुए
कई किलोमीटर तक ले आये
और फिर
एक दिन........
सरकार बदल गई
पर कुर्सियां नहीं बदली
एक नया आदेश पारित हुआ
सड़क का निर्माण
अवैध है
इसे तोड़ा जाए
शुरू से आखिर तक
और फिर
वही लोग
कागजों पर
पिल पड़े
हथोडे, कुदालें और सरिये ले कर
अब मैं टूट चुकी हूँ
कैसे कहूँ कि
मैं एक सड़क हूँ
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