लड़कों के साथ अक्सर होता था कि,
जो लड़की फर्स्ट इयर में पसंद आ जाए,
वो फाइनल इयर तक पसंद ही बनी रहती थी,
उस से बात करने कि हज़ारों नाकामयाब
कोशिशें होती थी, कई बार लफ्ज़ साथ...
नहीं देते, कई बार हालात।
लड़की भी जानती थी और कई बार
चाहती थी कि बात शुरू हो, पर
लड़का अक्सर इस शुरुआत को समझ
नहीं पाया। फेयरवेल पर दोस्त से माँगा हुआ
बढ़िया सा सूट पहना, और उसको साडी में
देख "सूरज हुआ मद्धम" भी इमैजिन किया,
लेकिन उस से कुछ नहीं पाया।
ऐसे अनकहे प्यार अक्सर हर कॉलेज
की कैंटीन टेबल पर उकेरे पाये जा सकते हैं।
ये अलग बात है कि लड़के के दोस्त आज
भी "उसे" अपनी "भाभी" ही कहते है...
जो लड़की फर्स्ट इयर में पसंद आ जाए,
वो फाइनल इयर तक पसंद ही बनी रहती थी,
उस से बात करने कि हज़ारों नाकामयाब
कोशिशें होती थी, कई बार लफ्ज़ साथ...
नहीं देते, कई बार हालात।
लड़की भी जानती थी और कई बार
चाहती थी कि बात शुरू हो, पर
लड़का अक्सर इस शुरुआत को समझ
नहीं पाया। फेयरवेल पर दोस्त से माँगा हुआ
बढ़िया सा सूट पहना, और उसको साडी में
देख "सूरज हुआ मद्धम" भी इमैजिन किया,
लेकिन उस से कुछ नहीं पाया।
ऐसे अनकहे प्यार अक्सर हर कॉलेज
की कैंटीन टेबल पर उकेरे पाये जा सकते हैं।
ये अलग बात है कि लड़के के दोस्त आज
भी "उसे" अपनी "भाभी" ही कहते है...
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